बुधवार, 27 दिसंबर 2017

ग़ज़ल-- मनाता रहूँ

212--212--212--212
दिल तो रोता है मैं गुनगुनाता रहूँ
कब तलक ख़ुद को पागल बनाता रहूँ

सोचता हूँ कि अब छोड़ दूँ शायरी
इक तिरे ग़म को कब तक भुनाता रहूँ

मेरी गिनती में ग़फ़लत न कोई रहे
ज़ख्म दिल के तुझे भी गिनाता रहूँ

ख़ुद नुमाइश करूँ अपनी ही लाश की
हाँ मैं ज़िंदा हूँ तुझको जनाता रहूँ

तू मिरे दर्द का लुत्फ़ लेती रहे
मैं तुझे हाल दिल का सुनाता रहूँ

इनसे गर दिल बहलता हो तेरा सनम
दिल के टुकड़ो को मैं खनखनाता रहूँ

इक यही इल्तिज़ा है मेरी तुमसे अब
यूँ ही रूठी रहो मैं मनाता रहूँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।



मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

सोच न लेना

सोच न लेना तू ऐसा इस
तन्हाई से डर जाऊँगा ।
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा
तेरे बिन मैं मर जाऊँगा ।।

तेरी यादों की लहरों से
दिल दिन रात घिरा रहता है ।
डूब रहा हूँ लेकिन इतना
तै है पार उतर जाऊँगा ।।

एक सफ़र है जीवन भी तो
कुछ दिन साथ चलेगें दोनों ।
तू भी अपने घर जाएगी
मैं भी अपने घर जाऊँगा ।।

बस्ती तेरी जंगल तेरा
महफ़िल-महफ़िल तेरा डेरा ।
तुझसे दूर अगर भागा तो
तू ही बोल किधर जाऊँगा ।।

उम्र गुजारी जितनी उससे
ज्यादा घाव सजे हैं दिल पर ।
खाकर ज़ख्म नया इक तुझसे
मैं तो और सँवर जाऊँगा ।।

मेरी मिट्टी पर दुनिया में
चाहे जो अधिकार जताए ।
लेकिन अपनी मीठी यादें
नाम तुम्हारे कर जाऊँगा ।।

मैं 'खुरशीद' लडूँगा दिन भर
इस दुनिया के अँधियारों से ।
ढलते-ढलते इन रातों में
एक उजाला भर जाऊँगा ।।
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर ।



सोमवार, 25 दिसंबर 2017

नई ग़ज़ल

2122--1212--112
प्यार को हादसा समझ लेना
तुम मुझे बेवफ़ा समझ लेना

दिल के इस रोग का इलाज़ नहीं
दर्द को ही दवा समझ लेना

अपनी मंज़िल क़रीब आने पर
मुझको इक रास्ता समझ लेना

क्या बताऊँ मैं हाले दिल तुझको
बेसदा है दुआ समझ लेना

जो भी समझाए तुझको दिल तेरा
उसमें मेरी रज़ा समझ लेना

बंदगी का मज़ा इसी में है
यार को ही ख़ुदा समझ लेना

मीत 'खुरशीद' जब बिछड़ जाए
ज़िंदगी को सज़ा समझ लेना
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




सोमवार, 18 दिसंबर 2017

एक सच्ची ग़ज़ल

मान रखा कब तुमने मन की मनुहारों का
फूलों को ठुकराकर साथ दिया खारों का

एक उदासी पोती तुमने मुस्कानों पर
खुश हो रंग उड़ाकर सारे त्यौहारों का

प्यार मिटा तो केवल हिंसा रह जाएगी
चीख रहा है हर इक पन्ना अखबारों का

रूठ गए तो उड़ जायेंगे ख़ुश्बू बनकर
कुछ विश्वास नहीं मनमौजी बनज़ारों का

हाथ मिलाते हैं दूरी दिल में रखकर भी
साथ निभाऊँ कैसे ऐसे किरदारों का

बोल किसी के काफ़ी है घायल करने को
दौर गया अब तीर कटारी तलवारों का

अश्क़ पिलाऊँगा तेरे पथ के फूलों को
यूँ अहसान चुकाऊँगा इन अंगारों का

तेरे पथ की धूल मिले तो जीवन चमके
क्या करना है मुझको नभ के इन तारों का

मेरी रुसवाई का कारण है सच्चाई
वक़्त हुआ है बंदी अब तो अय्यारों का
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

रविवार, 17 दिसंबर 2017

ग़ज़ल -कैसे

तुम बिसराओ मैं बिसराऊँ कैसे
प्रीत भुलाकर मैं इतराऊँ कैसे

मुझको यकीं है केवल मेरे हो तुम
जग से डरकर मैं घबराऊँ कैसे

तुम बिन जीना शोलों पर चलना है
सच्चाई से मैं कतराऊँ कैसे

आँखों से बरसात नहीं थमती है
हँसी लबों की मैं सुधराऊँ कैसे

नाम तुम्हारा धड़कन के मनकों में
इस माला को मैं बिखराऊँ कैसे
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




ग़ज़ल --रोग लगा है

रोग लगा है जीवन भर का
अब यह तन है धड़कन भर का

ओ! बदली में छुपने वाले
मैं प्यासा हूँ दर्शन भर का

मुझको केवल काँटे दे दो
तुम लूटो सुख उपवन भर का

प्यार फ़िज़ा में फैला मेरा
रूप तुम्हारा दरपन भर का

छाँव तुम्हें क्या दे पाऊँगा
इक बूटा हूँ आँगन भर का

मोल वफ़ा का देख लिया है
इक सोने के कंगन भर का

प्रीत जिसे कहती है दुनिया
एक भरम है इस मन भर का

क्या हल्का होगा अश्कों से
बोझ रिदय पर है टन भर का

मैंने सब में तुझको पाया
तू  है तेरे साजन भर का

तुम पत्थर हो ही निर्मोही
हक़ दो मुझको पूजन भर का
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

ग़ज़ल -खुश रहने की

खुश रहने की जितनी कोशिश करता हूँ
यूँ लगता है ग़म की साज़िश करता हूँ

मुड़कर तुमने हाल न पूछा घायल का
अपनी चोटों पर ख़ुद मालिश करता हूँ

छोड़ विरह के मरुथल में जाने वाले
ले तुझ पर गीतों की बारिश करता हूँ

उतना तेरी ओर निगोड़ा खिंचता है
जितनी अपने दिल पर बंदिश करता हूँ

दौलत-इज़्ज़त-शुहरत कब चाही मैंने
जोगी हूँ बस तेरी ख़्वाहिश करता हूँ
©खुरशीद खैराड़ी  जोधपुर ।

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

एक ताज़ा ग़ज़ल

सच्ची-झूठी सब तकरारें तू जाने
तेरी जीतें मेरी हारें तू जाने

मैंने काट दिए हैं सब ऊँचे परबत
नैतिकता की ये दीवारें तू जाने

तेरी नील चढ़ा ली है मैंने तन पर
तुझ पर किसकी चढ़ी फुहारें तू जाने

मैंने पतझर चुनकर तेरे जीवन को
अर्पित की हैं यार बहारें तू जाने

मेरे दिल के हर कोने में बस तू है
तेरे घर की यार  दरारें तू जाने

बैठ गया हूँ शीश झुकाकर चरणों में
चुप क्यों हैं तेरी तलवारें तू जाने
©खुरशीद  खैराड़ी जोधपुर।

एक सच्ची ग़ज़ल

मुझ पर तेरा रंग रहेगा
और न कोई संग रहेगा

मेरा सच्चा दीवानापन
देख ज़माना दंग रहेगा

इक दीवाने की आहों से
ध्यान तुम्हारा भंग रहेगा

तेरी उल्फ़त की मय पीकर
मनवा मस्त-मलंग रहेगा

मैं सब कुछ वारूँगा तुम पर
हाथ तुम्हारा तंग रहेगा

अंग लगाले चाहे जिसको
तू मेरा ही अंग रहेगा

ओल्ड य' धरती-अम्बर होंगे
प्यार हमारा यंग रहेगा

तेरी चाहत डोर रहेगी
जीवन एक पतंग रहेगा

तेरी यादों की थापों से
बजता दिल का चंग रहेगा
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

एक सुलगती ग़ज़ल

एक सुलगती ग़ज़ल---
122--122--122--122
सुकूँ का कोई सिल्सिला दे न पाया
जिसे पेड़ समझा हवा दे न पाया

हुआ दफ़्न किस्सा दिलों में हमारे
मैं क्या चाहता था वो क्या दे न पाया

ख़ताएँ गिनाता रहा मेरी लेकिन
सज़ा की कहा तो सज़ा दे न पाया

मिरे दिल का सागर सुखाकर गया जो
सुलगते लबों को घटा दे न पाया

मेरी क़ब्र पर जो बहाता है आँसू
मुझे ज़िंदगी की दुआ दे न पाया

मुझे आईना देखता है ब हैरत
मैं ख़ुद को मिरी ही अदा दे न पाया

पकड़ में मरज़ तो उसे आ गया था
बस इतना हुआ वो दवा दे न पाया

मुझे बेवफ़ा कह रहा है जो सादिक़
वफ़ा के बदल में वफ़ा दे न पाया

उजाले में 'खुरशीद' निकला वो ज़र्रा
अँधेरों में जो हौसला दे न पाया
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।
सादिक़--सत्यवादी

एक लाज़वाब ग़ज़ल

मेरे अज़ीज़ 'खुरशीद' भाई की धमाकेदार वापसी
2122--1212-- 22
चैन मेरा गया तुम्हारा क्या
तुमने मुड़कर मुझे पुकारा क्या

मैंने सारे हिसाब कर डाले
कर्ज़ तुमने भी कुछ उतारा क्या

आ गया फिर मुझे रुलाने वो
आँसुओं को हँसी पे वारा क्या

कोई क़ातिल मिलेगा तुमसा फिर
प्यार होगा मुझे दुबारा क्या

जानते हैं तो जान जाएं सब
मेरे गीतों में है इशारा क्या

ख़ाब था या कोई हक़ीक़त थी
साथ तुमने मिरे गुज़ारा क्या

पूछकर  मेरी हार से देखो
तुमने जीता है खेल सारा क्या

पड़ गई सिलवटें मिरे दिल पर
ज़ुल्फ़ को तुमने फिर सँवारा क्या

टिमटिमाते हो क्यों घटाओं में
तुम भी 'खुरशीद' हो सितारा क्या
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर 9413408422

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

एक परेशान ग़ज़ल

एक परेशान ग़ज़ल....
डोरे-ताँते, जंतर-मंतर करदे कोई
तेरी यादें तीतर-बीतर करदे कोई

भूल गया हूँ अपने तन को तेरा होकर
मुझको फिर से मेरे भीतर करदे कोई

चारागर ख़ुद आकर ज़ह्र मुझे दे जाए
मेरी हालात इतनी बदतर करदे कोई

तीर निगाहों का खेंचा है फिर ज़ालिम ने
मेरे दिल को आज कबूतर करदे कोई

तुझको मेरी सोच भी छूने से कतराए
तुझमें-मुझमें इतना अंतर करदे कोई

क्या हो गर ज़िंदा रहने की कसमें देकर
आती-जाती साँसें नश्तर करदे कोई

जीवन भर काँटों की सेज मिली है मुझको
अर्थी पर फूलों का बिस्तर करदे कोई
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।09413408422
चारागर = डॉक्टर (चिकित्सक)

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एक भोली ग़ज़ल

तू मुझको गर मिल जाता
स्वर्ग धरा पर मिल जाता

राधा-मोहन हम होते
कलि को द्वापर मिल जाता

तू मिल जाता चाँद मुझे
सारा अंबर मिल जाता

तेरी सेवा का मुझको
थोड़ा अवसर मिल जाता

जीवन के इस पोथे में
ढाई आखर मिल जाता

तेरे दिल की बस्ती में
मुझको भी घर मिल जाता

मरुथल से इस जीवन में
कोई निर्झर मिल जाता

प्रेम के सागर! तेरा जल
इक अँजुरी भर मिल जाता

बाट निहारी जीवन भर
ख़ुद ही आकर मिल जाता

तुझको पाकर हंसा को
मानसरोवर मिल जाता
©महावीर सिंह जोधपुर।

एक पावन सी ग़ज़ल

एक पावन भजन सी ग़ज़ल ......
इक पछतावा जीवन भर का रक्खा है
सपना तेरा अँखियन भर का रक्खा है

मुझको तेरी कितनी हसरत है फिर भी
तुझको तेरे साजन भर का रक्खा है

होठों की मुस्कान बनी कितनी यादें
कुछ यादों को अँसुवन भर का रक्खा है

मेरी आँखों में भी झाँक लिया होता
रूप सलोना दरपन भर का रक्खा है

बँगला-गाड़ी पाकर भी सुख दूर रहा
इक इस धन को निर्धन भर का रक्खा है

प्यास बुझाऊँ कैसे मीठे दरिया से
चातक दिल को सावन भर का रक्खा है

राधा संग बिराजे डाल कदम्बी पर
इक तुलसी को आँगन भर का रक्खा है

इक मीरा ने ठुकराया सुख महलों का
अपने मन को मोहन भर का रक्खा है

कितने ही चेहरे दिल को मेरे भाए
इक चेहरे को दर्शन भर का रक्खा है

घर में यार सजाया है कुछ काँटों को
कुछ फूलो को उपवन भर का रक्खा है

पीपल जैसा पावन माना है इसको
प्यार तुम्हारा पूजन भर का रक्खा है
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

एक दिल की ग़ज़ल

दीवाना दिल बात सयानी कहता है
मुस्कानों में आँख का पानी कहता है

नाज़ कराती है कितना दिल की दौलत भी
एक फ़क़ीरा तुझको रानी कहता है

ओ शहज़ादी! तुझको भाएगा कैसे वो
दास कबीरा की जो बानी कहता है

प्यास लगे तो आँसू पीता है शायर
भूख लगे तो बस गुड़-धानी कहता है

सुनते-सुनते आँख लगी जग वालों की
दुखिया अपनी राम कहानी कहता है

नूर सवेरे का आँखों को बतलाकर
वो ज़ुल्फ़ों को शाम सुहानी कहता है

उसके दिल में कितना दर्द जमा होगा
हँसती ग़ज़लें यार ज़ुबानी कहता है

सच बतला 'खुरशीद' हुनर कैसे सिखा
रोते-रोते  बात लुभानी कहता है
© 'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।9413408422

भाई दूज की ग़ज़ल

मेरा बीरा मेरा चंदा रहे नीका
यही कहता है भाईदूज का टीका

निभाने प्रीत आ जाना मिरे भैया
ए! राजा बिन तिरे सब कुछ लगे फ़ीका

मैं बाबा से छुपाऊँ लाख ग़म अपना
छुपेगा हाल तुझसे क्या मिरे जी का

लिपाऊँ चौक केसर और चंदन से
तू आए तो जलाऊँ दीप मैं घी का
 
बलाएँ लूँ  दुआएँ दूँ  तुझे लाखों
अमर बनकर रहे सिन्दूर भाभी का
भाई-बहन के अमर त्यौहार भाई-दूज की ढेरों शुभकामनाएँ।
© महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

एक ग़ज़ल ---लेकर आया

नेह सबूतों की बैसाखी लेकर आया
जग हँसता है प्यार गवाही लेकर आया

यार गले से लगकर भी दिल में दूरी है
मिलने की तू चाहत आधी लेकर आया

सुनलो दिल पर अपने ताला जड़ने वालों
मैं ग़ज़लों में अपनी, चाबी लेकर आया

ख़ाब उजाले का आधा ही रक्खा उसने
दीपक लाया साथ धुँआ भी लेकर आया

ग़म तो भूला होश नहीं लेकिन अब ख़ुद का
कैसी आफ़त साथ शराबी लेकर आया

पागल कहती है दुनिया 'खुरशीद' तुझे क्यों
इक तू ही तो अक़्ल ज़रा सी लेकर आया
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर 9413408422

एक मासूम ग़ज़ल

एक प्यारी सी मासूम ग़ज़ल
अश्कों से भीगी दीवाने की पाती है
पढ़कर दीवानों की आँखें भर आती है

गीत तुम्हारे नाम लिखे हैं मैंने सारे
मेरी सारी ग़ज़लें तुमसे बतियाती है

मैं तुमको क्या हाल सुनाऊँ अपने जी का
मेरे दिल का दर्द सुनो कोयल गाती है

तुमने गहनों-लत्तों से तोला उल्फ़त को
प्रीत कहाँ कंकर-पत्थर से तुल पाती है

मेरा तुमसे जो रिश्ता है, इस दुनिया को
चाँद-चकोरे की जोड़ी कुछ समझाती है

नील-गगन में बनकर सूरज तुम चमको अब
मेरा जीवन तो बुझती सी इक बाती है

मेरी आँखों में जगमग करता है जो सच
यार तुम्हारी आँखें उसको झुठलाती है

महफ़िल-महफ़िल हँसता-गाता बंजारा था
इस दिल को तनहाई अब कितना भाती है
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

एक ग़ज़ल-रामा शामा

गोवर्धन एक ग़ज़ल....
माना ग़म का परबत काफ़ी भारी है
एक हँसी की लघु-उँगली गिरधारी है

तकलीफ़ों की बारिश बरसे कितनी भी
हिम्मत के इक गोवर्धन से हारी है

रूठे कोई राजा मन के गोकुल से
गोवर्धन के नीचे नगरी सारी है

लज्जित है भीतर अन्नकूटों की शोभा
मंदिर के द्वारे पर भूख हमारी है

कंस अभी तक है मथुरा की गद्दी पर
गाय रियाया हर युग में दुखियारी है

खार घुला है मिसरी जैसे रिश्तों में
आज मिठाई दीवाली की खारी है

नफ़रत भूलो प्यार बसाओ इस दिल में
रामा-शामा पर यह अर्ज़ हमारी है
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

रूप चवदस के दोहे

रूप-चौदस के 14(चौदह) दोहे....
मन-आँगन में माँढ़ना, चटकीले शुभ रंग ।
रंगोली को देखकर, लोग हुए हैं दंग ।।...1

चौक पुराया प्रेम से, प्रेम जलाया दीप ।
चमका मोती प्रेम का, नैन हमारे सीप ।।...2

बालों को रेशम किया, घूँघर ली है डाल ।
वेणी सुन्दर गूँथकर, चाँद सजाया भाल ।।...3

तीखी भौहें यूँ तनी, जैसे काम-कमान ।
रेखा काजल की चली, करने शर-संधान ।।...4

माथे पर टिकला सजा, दमका तुमरा प्यार ।
सीने से साजन लगे, बनकर तुम गलहार ।।...5

रूप सजाया चाव से, आन निहारो पीव ।
साजन तेरी राह में, अटका मेरा जीव ।।...6

उबटन मलकर धूप का, दमकी गौरी देह ।
जगमग मेरे रूप की, साजन तेरा नेह ।।...7

प्रेम चुनरिया ओढ़ ली, कर सोलह सिणगार ।
गहना मेरा प्रेम है, पहनूँ तुझको यार ।।...8

चवदस की इस रात में, जगमग मेरा रूप ।
झीना घूँघट ओढ़कर , छितराई है धूप ।।...9

लाली होठों पर सजी, गालों पर है लाज ।
नथनी तेरे नाम की, चमकी कितनी आज ।।...10

रूप सजाकर मैं खड़ी, देख रही बाज़ार ।
मोल मिले तो मोल लूँ, साजन तेरा प्यार ।।...11

बाज़ारों में धूम है, गलियों में है नूर ।
सज-धज मेरी देखकर, लोग रहे हैं घूर ।।...12

'मैं' को अपने झाड़कर, पोता तेरा नेह ।
झूमर टाँगी प्रीत की, चमका मन का गेह ।।...13

प्रेम बिना जीवन नरक, प्रेम स्वर्ग का धाम ।
प्रेम उजाला भोर का, प्रेम सुहानी शाम ।।...14
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर 9413408422
आप सभी को रूप-चौदस (विश्व-सौंदर्य दिवस) की शुभकामनाएँ। आपके जीवन में रूप और सौंदर्य बना रहे और जीवन मधुर मधुमास हो जाए।
विनीत
महावीर सिंह और सभी स्नेहिल परिजन।