गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

एक सुलगती ग़ज़ल

एक सुलगती ग़ज़ल---
122--122--122--122
सुकूँ का कोई सिल्सिला दे न पाया
जिसे पेड़ समझा हवा दे न पाया

हुआ दफ़्न किस्सा दिलों में हमारे
मैं क्या चाहता था वो क्या दे न पाया

ख़ताएँ गिनाता रहा मेरी लेकिन
सज़ा की कहा तो सज़ा दे न पाया

मिरे दिल का सागर सुखाकर गया जो
सुलगते लबों को घटा दे न पाया

मेरी क़ब्र पर जो बहाता है आँसू
मुझे ज़िंदगी की दुआ दे न पाया

मुझे आईना देखता है ब हैरत
मैं ख़ुद को मिरी ही अदा दे न पाया

पकड़ में मरज़ तो उसे आ गया था
बस इतना हुआ वो दवा दे न पाया

मुझे बेवफ़ा कह रहा है जो सादिक़
वफ़ा के बदल में वफ़ा दे न पाया

उजाले में 'खुरशीद' निकला वो ज़र्रा
अँधेरों में जो हौसला दे न पाया
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।
सादिक़--सत्यवादी

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