रोग लगा है जीवन भर का
अब यह तन है धड़कन भर का
ओ! बदली में छुपने वाले
मैं प्यासा हूँ दर्शन भर का
मुझको केवल काँटे दे दो
तुम लूटो सुख उपवन भर का
प्यार फ़िज़ा में फैला मेरा
रूप तुम्हारा दरपन भर का
छाँव तुम्हें क्या दे पाऊँगा
इक बूटा हूँ आँगन भर का
मोल वफ़ा का देख लिया है
इक सोने के कंगन भर का
प्रीत जिसे कहती है दुनिया
एक भरम है इस मन भर का
क्या हल्का होगा अश्कों से
बोझ रिदय पर है टन भर का
मैंने सब में तुझको पाया
तू है तेरे साजन भर का
तुम पत्थर हो ही निर्मोही
हक़ दो मुझको पूजन भर का
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
अब यह तन है धड़कन भर का
ओ! बदली में छुपने वाले
मैं प्यासा हूँ दर्शन भर का
मुझको केवल काँटे दे दो
तुम लूटो सुख उपवन भर का
प्यार फ़िज़ा में फैला मेरा
रूप तुम्हारा दरपन भर का
छाँव तुम्हें क्या दे पाऊँगा
इक बूटा हूँ आँगन भर का
मोल वफ़ा का देख लिया है
इक सोने के कंगन भर का
प्रीत जिसे कहती है दुनिया
एक भरम है इस मन भर का
क्या हल्का होगा अश्कों से
बोझ रिदय पर है टन भर का
मैंने सब में तुझको पाया
तू है तेरे साजन भर का
तुम पत्थर हो ही निर्मोही
हक़ दो मुझको पूजन भर का
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
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