बुधवार, 27 दिसंबर 2017

ग़ज़ल-- मनाता रहूँ

212--212--212--212
दिल तो रोता है मैं गुनगुनाता रहूँ
कब तलक ख़ुद को पागल बनाता रहूँ

सोचता हूँ कि अब छोड़ दूँ शायरी
इक तिरे ग़म को कब तक भुनाता रहूँ

मेरी गिनती में ग़फ़लत न कोई रहे
ज़ख्म दिल के तुझे भी गिनाता रहूँ

ख़ुद नुमाइश करूँ अपनी ही लाश की
हाँ मैं ज़िंदा हूँ तुझको जनाता रहूँ

तू मिरे दर्द का लुत्फ़ लेती रहे
मैं तुझे हाल दिल का सुनाता रहूँ

इनसे गर दिल बहलता हो तेरा सनम
दिल के टुकड़ो को मैं खनखनाता रहूँ

इक यही इल्तिज़ा है मेरी तुमसे अब
यूँ ही रूठी रहो मैं मनाता रहूँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें