सच्ची-झूठी सब तकरारें तू जाने
तेरी जीतें मेरी हारें तू जाने
मैंने काट दिए हैं सब ऊँचे परबत
नैतिकता की ये दीवारें तू जाने
तेरी नील चढ़ा ली है मैंने तन पर
तुझ पर किसकी चढ़ी फुहारें तू जाने
मैंने पतझर चुनकर तेरे जीवन को
अर्पित की हैं यार बहारें तू जाने
मेरे दिल के हर कोने में बस तू है
तेरे घर की यार दरारें तू जाने
बैठ गया हूँ शीश झुकाकर चरणों में
चुप क्यों हैं तेरी तलवारें तू जाने
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
तेरी जीतें मेरी हारें तू जाने
मैंने काट दिए हैं सब ऊँचे परबत
नैतिकता की ये दीवारें तू जाने
तेरी नील चढ़ा ली है मैंने तन पर
तुझ पर किसकी चढ़ी फुहारें तू जाने
मैंने पतझर चुनकर तेरे जीवन को
अर्पित की हैं यार बहारें तू जाने
मेरे दिल के हर कोने में बस तू है
तेरे घर की यार दरारें तू जाने
बैठ गया हूँ शीश झुकाकर चरणों में
चुप क्यों हैं तेरी तलवारें तू जाने
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
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