रविवार, 17 दिसंबर 2017

ग़ज़ल -कैसे

तुम बिसराओ मैं बिसराऊँ कैसे
प्रीत भुलाकर मैं इतराऊँ कैसे

मुझको यकीं है केवल मेरे हो तुम
जग से डरकर मैं घबराऊँ कैसे

तुम बिन जीना शोलों पर चलना है
सच्चाई से मैं कतराऊँ कैसे

आँखों से बरसात नहीं थमती है
हँसी लबों की मैं सुधराऊँ कैसे

नाम तुम्हारा धड़कन के मनकों में
इस माला को मैं बिखराऊँ कैसे
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




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