सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एक पावन सी ग़ज़ल

एक पावन भजन सी ग़ज़ल ......
इक पछतावा जीवन भर का रक्खा है
सपना तेरा अँखियन भर का रक्खा है

मुझको तेरी कितनी हसरत है फिर भी
तुझको तेरे साजन भर का रक्खा है

होठों की मुस्कान बनी कितनी यादें
कुछ यादों को अँसुवन भर का रक्खा है

मेरी आँखों में भी झाँक लिया होता
रूप सलोना दरपन भर का रक्खा है

बँगला-गाड़ी पाकर भी सुख दूर रहा
इक इस धन को निर्धन भर का रक्खा है

प्यास बुझाऊँ कैसे मीठे दरिया से
चातक दिल को सावन भर का रक्खा है

राधा संग बिराजे डाल कदम्बी पर
इक तुलसी को आँगन भर का रक्खा है

इक मीरा ने ठुकराया सुख महलों का
अपने मन को मोहन भर का रक्खा है

कितने ही चेहरे दिल को मेरे भाए
इक चेहरे को दर्शन भर का रक्खा है

घर में यार सजाया है कुछ काँटों को
कुछ फूलो को उपवन भर का रक्खा है

पीपल जैसा पावन माना है इसको
प्यार तुम्हारा पूजन भर का रक्खा है
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

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