गोवर्धन एक ग़ज़ल....
माना ग़म का परबत काफ़ी भारी है
एक हँसी की लघु-उँगली गिरधारी है
तकलीफ़ों की बारिश बरसे कितनी भी
हिम्मत के इक गोवर्धन से हारी है
रूठे कोई राजा मन के गोकुल से
गोवर्धन के नीचे नगरी सारी है
लज्जित है भीतर अन्नकूटों की शोभा
मंदिर के द्वारे पर भूख हमारी है
कंस अभी तक है मथुरा की गद्दी पर
गाय रियाया हर युग में दुखियारी है
खार घुला है मिसरी जैसे रिश्तों में
आज मिठाई दीवाली की खारी है
नफ़रत भूलो प्यार बसाओ इस दिल में
रामा-शामा पर यह अर्ज़ हमारी है
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422
माना ग़म का परबत काफ़ी भारी है
एक हँसी की लघु-उँगली गिरधारी है
तकलीफ़ों की बारिश बरसे कितनी भी
हिम्मत के इक गोवर्धन से हारी है
रूठे कोई राजा मन के गोकुल से
गोवर्धन के नीचे नगरी सारी है
लज्जित है भीतर अन्नकूटों की शोभा
मंदिर के द्वारे पर भूख हमारी है
कंस अभी तक है मथुरा की गद्दी पर
गाय रियाया हर युग में दुखियारी है
खार घुला है मिसरी जैसे रिश्तों में
आज मिठाई दीवाली की खारी है
नफ़रत भूलो प्यार बसाओ इस दिल में
रामा-शामा पर यह अर्ज़ हमारी है
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422
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