तू मुझको गर मिल जाता
स्वर्ग धरा पर मिल जाता
राधा-मोहन हम होते
कलि को द्वापर मिल जाता
तू मिल जाता चाँद मुझे
सारा अंबर मिल जाता
तेरी सेवा का मुझको
थोड़ा अवसर मिल जाता
जीवन के इस पोथे में
ढाई आखर मिल जाता
तेरे दिल की बस्ती में
मुझको भी घर मिल जाता
मरुथल से इस जीवन में
कोई निर्झर मिल जाता
प्रेम के सागर! तेरा जल
इक अँजुरी भर मिल जाता
बाट निहारी जीवन भर
ख़ुद ही आकर मिल जाता
तुझको पाकर हंसा को
मानसरोवर मिल जाता
©महावीर सिंह जोधपुर।
स्वर्ग धरा पर मिल जाता
राधा-मोहन हम होते
कलि को द्वापर मिल जाता
तू मिल जाता चाँद मुझे
सारा अंबर मिल जाता
तेरी सेवा का मुझको
थोड़ा अवसर मिल जाता
जीवन के इस पोथे में
ढाई आखर मिल जाता
तेरे दिल की बस्ती में
मुझको भी घर मिल जाता
मरुथल से इस जीवन में
कोई निर्झर मिल जाता
प्रेम के सागर! तेरा जल
इक अँजुरी भर मिल जाता
बाट निहारी जीवन भर
ख़ुद ही आकर मिल जाता
तुझको पाकर हंसा को
मानसरोवर मिल जाता
©महावीर सिंह जोधपुर।
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