सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एक भोली ग़ज़ल

तू मुझको गर मिल जाता
स्वर्ग धरा पर मिल जाता

राधा-मोहन हम होते
कलि को द्वापर मिल जाता

तू मिल जाता चाँद मुझे
सारा अंबर मिल जाता

तेरी सेवा का मुझको
थोड़ा अवसर मिल जाता

जीवन के इस पोथे में
ढाई आखर मिल जाता

तेरे दिल की बस्ती में
मुझको भी घर मिल जाता

मरुथल से इस जीवन में
कोई निर्झर मिल जाता

प्रेम के सागर! तेरा जल
इक अँजुरी भर मिल जाता

बाट निहारी जीवन भर
ख़ुद ही आकर मिल जाता

तुझको पाकर हंसा को
मानसरोवर मिल जाता
©महावीर सिंह जोधपुर।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें