गुरुवार, 27 जनवरी 2022

ग़ज़ल: जान की आफ़त रफ़ाक़त हो गई

 2122 - 2122 - 212 

जान की आफ़त रफ़ाक़त हो गई।

इक वबा की लो इनायत हो गई।


आज रोते हो कि आफ़त हो गई।

कल तो कहते थे मोहब्बत हो गई।


सारी दुनिया से खफ़ा हो किसलिए,

क्या हुआ किस से अदावत हो गई।


बात कुछ थी, लोग समझे बात कुछ,

बाइस-ए-उलझन वज़ाहत हो गई।


आप ही तो थे हमारी काइनात,

आप रूठे तो क़यामत हो गई।


कोई सानी ही नहीं क्या नाम दें,

इस क़दर ओछी सियासत हो गई।


पूछिए 'ख़ुरशीद' से 'क्या हो गया?',

रौशनी से क्यों शिकायत हो गई।

©'ख़ुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।

9001198483

रफ़ाक़त-मेलजोल, वबा-महामारी

बाइसे उलझन-उलझन का कारण

वज़ाहत-स्पष्टीकरण, सानी-समतुल्य

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