मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

ग़ज़ल लत लागी

जोगन जैसी गत लागी
मुझको पी की लत लागी

एक हुए आँगन तन के
मन से मन की छत लागी

वारा तुझ पर तन-मन-धन
फिर भी कम कीमत लागी

प्रेम रतन धन जब पाया
माटी सी दौलत लागी

साथ पिया का जब पाया
यह धरती जन्नत लागी

एक हुई अपनी सूरत
सीरत से सीरत लागी

मिसरी सी तेरी संगत
रातें सब शरबत लागी
©महावीर सिंह जोधपुर 26.2.2018

शनिवार, 27 जनवरी 2018

ग़ज़ल रहेगा क्या अब

हाल ऐसा ही रहेगा क्या अब
दिल य' रोता ही रहेगा क्या अब

दास्तां छोड़ गए हो आधी
चाँद आधा ही रहेगा क्या अब

देखने को तेरी इस दुनिया में
उनका चेहरा ही रहेगा क्या अब

आपने हाल न पूछा मुड़कर
कोई ज़िंदा ही रहेगा क्या अब

नफ़रतों से है मिरा इक ही सवाल
प्यार किस्सा ही रहेगा क्या अब

आँधियाँ हार गई हैं सारी
दीप जलता ही रहेगा क्या अब

चौंक जाता हूँ हर इक आहट पर
मुझको धोखा ही रहेगा क्या अब

मेरी आँखों प' तरस तो खाओ
रुख प' परदा ही रहेगा क्या अब

उनसे कह दो कि बता दे अंज़ाम
कोई उनका ही रहेगा क्या अब

मेरी बातों में मेरी ग़ज़लों में
तेरा चर्चा ही रहेगा क्या अब

बहते हैं गीत लबों पर दिन रात
ज़ख्म रिसता ही रहेगा क्या अब

अश्क़ 'खुरशीद' छुपाकर अपने
यूँ ही हँसता ही रहेगा क्या अब
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।



सोमवार, 22 जनवरी 2018

एक ग़ज़ल बहार पर

आ गई है बहार फूलों पर
छा रहा है ख़ुमार फूलो पर

दिल का भँवरा य' गुनगुनाता है
ख़ुद को करदूँ निसार फूलों पर

ख़ार चुनकर तमाम पलकों से
आपका इंतिज़ार फूलों पर

आपकी इक झलक पड़ी भारी
इस चमन के हज़ार फूलों पर

आइए आपको मैं रक्खूँगा
उम्र भर बेशुमार फूलों पर

मुझको ख़ाबों में रोज़ दिखती है
तितलियों की कतार फूलों पर

आज मेरी ग़ज़ल महकती है
मुझको आया है प्यार फूलों पर

आप हँसकर चमन से गुजरे हो
आ गया है निखार फूलों पर

देखकर आपको क़रार आए
दिल हुआ बेक़रार फूलों पर

नींद आई न रात भर उनको
करवटें ली हज़ार फूलों पर

आइए आप पर कहूँ ग़ज़लें
क्या कहूँ बार-बार फूलों पर

आपकी याद को भुला देगें
मुझको है ऐतिबार फूलों पर

साथ पतझर के ज़िंदगी बीती
क्या कहे ख़ाकसार फूलों पर
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर। 9413408422

शनिवार, 20 जनवरी 2018

ताज़ा ग़ज़ल

मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है
मरज़ ठीक होगा नहीं लग रहा है

मेरी बेक़रारी हुई चैन उसका
ये सौदा तो महँगा नहीं लग रहा है

बहलने लगा है उधर दिल किसी का
इधर दिल किसी का नहीं लग रहा है

भुलाना है तो भूल जाओ मुझे तुम
मेरा तो इरादा नहीं लग रहा है

क़रीब इतना है वो कि सुनता है धड़कन
सदाएँ सुनेगा नहीं लग रहा है

तिरा प्यार ओढ़ा है जबसे बदन पर
कोई रंग फीका नहीं लग रहा है

शिकन तेरे माथे पे आई है क्यों कर
मेरा दिल तो टूटा नहीं लग रहा है

वो जो चाँद है-जैसे चेहरा है तेरा
फ़लक आइने सा नहीं लग रहा है?

कोई अज़नबी शह्र में खो गया हो
मेरा हाल ऐसा नहीं लग रहा है?

गले बारहा मिल रहा है सभी से
वो महफ़िल में तनहा नहीं लग रहा है

जो 'खुरशीद' लगता था इस आसमां पर
ज़मीं पर वो ज़र्रा नहीं लग रहा है
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।

रविवार, 14 जनवरी 2018

दोहे संक्रांत

सक्रांत के दोहे---
माझा तेरे प्रेम का, जीवन एक पतंग ।
नीलगगन आनंद का, मनवा मस्त मलंग ।।

ग़ज़लें मीठी रेवड़ी, तिल-पट्टी से गीत ।
खीच बनाया नेह का, आ जाओ मनमीत ।।

तिल में गुड़ जैसे घुले, दिल में मुझको घोल ।
मीठा हर पल को करे, प्रेम गज़क अनमोल ।।

ढोल बजे ताशे बजे, झाँझर की झणकार ।
पीव मिलन की लोहड़ी, झूम रहा संसार ।।

धूप गुलाबी ओढ़नी, मोती चमके ओस ।
माघ मुहूरत मेल का, प्यारे प्रीत परोस ।।
©महावीर सिंह जोधपुर।

शनिवार, 13 जनवरी 2018

मोह लगा रक्खा है

हमने भी किस दुश्वारी से मोह लगा रक्खा है
रेशम होकर चिंगारी से मोह लगा रक्खा है

चाहें तो अच्छे हो जाएं लेकिन चाह नहीं अब
दिल ने दिल की बीमारी से मोह लगा रक्खा है

काम तो इतने हैं जीवन भर साँस न लेने पाएं
फ़ुर्सत में हैं बेकारी से मोह लगा रक्खा है

कीड़े ही चाटेंगे उन कपड़ों की ज़रदोज़ी को
जिन कपड़ों ने अलमारी से मोह लगा रक्खा है

आवारा मन छोड़ आया है बस्ती सच्चाई की
कुछ सपनों की सरदारी से मोह लगा रक्खा है

इक तितली के सपनों की ख़ातिर मन के आँचल ने
काँटें चुनकर फुलवारी से मोह लगा रक्खा है

दूर उदासी को करने के सामां हैं पग-पग पर
फिर भी मन ने बेज़ारी से मोह लगा रक्खा है

मेरे अहसासों की तुझको क़द्र नहीं है कुछ भी
मैंने क्यों तेरी यारी से मोह लगा रक्खा है

चाँदी के पलड़े में मोल वफ़ा का तोले है वो
इस दिल ने इक व्यापारी से मोह लगा रक्खा है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
बेज़ारी-अप्रसन्नता
दुश्वारी-मुश्किल


बुधवार, 10 जनवरी 2018

गीत --विदाई

कुछ दिन में घर सूना-सूना हो जाएगा ।।

हर कोने-आले की साज-सजावट तुझको ढूँढ़ेगी
तेरे कमरे में तेरी ही आहट तुझको ढूँढ़ेगी
बोर सवेरा होगा साँझ थकावट तुझको ढूँढ़ेगी
पापा की चिढ़-चिढ़ माँ की झुँझलाहट तुझको ढूँढ़ेगी

मुश्किल परछाई को छूना हो जाएगा ।
कुछ दिन में घर सूना-सूना हो जाएगा ।।

बस इक फाँक हँसी को दिन की सूनी थाली तरसेगी
तेरी बातों की मठरी को चाय की प्याली तरसेगी
तुझको गोद उठाने को इक कुरसी खाली तरसेगी
बुलबुल तेरी चहक-फुदक को डाली-डाली तरसेगी

मरुथल का इक बाग़ नमूना हो जाएगा ।
कुछ दिन में घर सूना सूना हो जाएगा ।।

बालकनी में अखबारों का ढेर लगेगा थोड़े दिन
तन्हाई में भैया सारी रात जगेगा थोड़े दिन
सपनों में भी इस्कूटी का हॉर्न बजेगा थोड़े दिन
सदमा दिल में रसोई के भी हाय! रहेगा थोड़े दिन

सावन में तो ग़म सौ गूना हो जाएगा ।
कुछ दिन में घर सूना सूना हो जाएगा ।।
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

ग़ज़ल-- मनाता रहूँ

212--212--212--212
दिल तो रोता है मैं गुनगुनाता रहूँ
कब तलक ख़ुद को पागल बनाता रहूँ

सोचता हूँ कि अब छोड़ दूँ शायरी
इक तिरे ग़म को कब तक भुनाता रहूँ

मेरी गिनती में ग़फ़लत न कोई रहे
ज़ख्म दिल के तुझे भी गिनाता रहूँ

ख़ुद नुमाइश करूँ अपनी ही लाश की
हाँ मैं ज़िंदा हूँ तुझको जनाता रहूँ

तू मिरे दर्द का लुत्फ़ लेती रहे
मैं तुझे हाल दिल का सुनाता रहूँ

इनसे गर दिल बहलता हो तेरा सनम
दिल के टुकड़ो को मैं खनखनाता रहूँ

इक यही इल्तिज़ा है मेरी तुमसे अब
यूँ ही रूठी रहो मैं मनाता रहूँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।



मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

सोच न लेना

सोच न लेना तू ऐसा इस
तन्हाई से डर जाऊँगा ।
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा
तेरे बिन मैं मर जाऊँगा ।।

तेरी यादों की लहरों से
दिल दिन रात घिरा रहता है ।
डूब रहा हूँ लेकिन इतना
तै है पार उतर जाऊँगा ।।

एक सफ़र है जीवन भी तो
कुछ दिन साथ चलेगें दोनों ।
तू भी अपने घर जाएगी
मैं भी अपने घर जाऊँगा ।।

बस्ती तेरी जंगल तेरा
महफ़िल-महफ़िल तेरा डेरा ।
तुझसे दूर अगर भागा तो
तू ही बोल किधर जाऊँगा ।।

उम्र गुजारी जितनी उससे
ज्यादा घाव सजे हैं दिल पर ।
खाकर ज़ख्म नया इक तुझसे
मैं तो और सँवर जाऊँगा ।।

मेरी मिट्टी पर दुनिया में
चाहे जो अधिकार जताए ।
लेकिन अपनी मीठी यादें
नाम तुम्हारे कर जाऊँगा ।।

मैं 'खुरशीद' लडूँगा दिन भर
इस दुनिया के अँधियारों से ।
ढलते-ढलते इन रातों में
एक उजाला भर जाऊँगा ।।
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर ।



सोमवार, 25 दिसंबर 2017

नई ग़ज़ल

2122--1212--112
प्यार को हादसा समझ लेना
तुम मुझे बेवफ़ा समझ लेना

दिल के इस रोग का इलाज़ नहीं
दर्द को ही दवा समझ लेना

अपनी मंज़िल क़रीब आने पर
मुझको इक रास्ता समझ लेना

क्या बताऊँ मैं हाले दिल तुझको
बेसदा है दुआ समझ लेना

जो भी समझाए तुझको दिल तेरा
उसमें मेरी रज़ा समझ लेना

बंदगी का मज़ा इसी में है
यार को ही ख़ुदा समझ लेना

मीत 'खुरशीद' जब बिछड़ जाए
ज़िंदगी को सज़ा समझ लेना
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




सोमवार, 18 दिसंबर 2017

एक सच्ची ग़ज़ल

मान रखा कब तुमने मन की मनुहारों का
फूलों को ठुकराकर साथ दिया खारों का

एक उदासी पोती तुमने मुस्कानों पर
खुश हो रंग उड़ाकर सारे त्यौहारों का

प्यार मिटा तो केवल हिंसा रह जाएगी
चीख रहा है हर इक पन्ना अखबारों का

रूठ गए तो उड़ जायेंगे ख़ुश्बू बनकर
कुछ विश्वास नहीं मनमौजी बनज़ारों का

हाथ मिलाते हैं दूरी दिल में रखकर भी
साथ निभाऊँ कैसे ऐसे किरदारों का

बोल किसी के काफ़ी है घायल करने को
दौर गया अब तीर कटारी तलवारों का

अश्क़ पिलाऊँगा तेरे पथ के फूलों को
यूँ अहसान चुकाऊँगा इन अंगारों का

तेरे पथ की धूल मिले तो जीवन चमके
क्या करना है मुझको नभ के इन तारों का

मेरी रुसवाई का कारण है सच्चाई
वक़्त हुआ है बंदी अब तो अय्यारों का
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

रविवार, 17 दिसंबर 2017

ग़ज़ल -कैसे

तुम बिसराओ मैं बिसराऊँ कैसे
प्रीत भुलाकर मैं इतराऊँ कैसे

मुझको यकीं है केवल मेरे हो तुम
जग से डरकर मैं घबराऊँ कैसे

तुम बिन जीना शोलों पर चलना है
सच्चाई से मैं कतराऊँ कैसे

आँखों से बरसात नहीं थमती है
हँसी लबों की मैं सुधराऊँ कैसे

नाम तुम्हारा धड़कन के मनकों में
इस माला को मैं बिखराऊँ कैसे
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




ग़ज़ल --रोग लगा है

रोग लगा है जीवन भर का
अब यह तन है धड़कन भर का

ओ! बदली में छुपने वाले
मैं प्यासा हूँ दर्शन भर का

मुझको केवल काँटे दे दो
तुम लूटो सुख उपवन भर का

प्यार फ़िज़ा में फैला मेरा
रूप तुम्हारा दरपन भर का

छाँव तुम्हें क्या दे पाऊँगा
इक बूटा हूँ आँगन भर का

मोल वफ़ा का देख लिया है
इक सोने के कंगन भर का

प्रीत जिसे कहती है दुनिया
एक भरम है इस मन भर का

क्या हल्का होगा अश्कों से
बोझ रिदय पर है टन भर का

मैंने सब में तुझको पाया
तू  है तेरे साजन भर का

तुम पत्थर हो ही निर्मोही
हक़ दो मुझको पूजन भर का
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

ग़ज़ल -खुश रहने की

खुश रहने की जितनी कोशिश करता हूँ
यूँ लगता है ग़म की साज़िश करता हूँ

मुड़कर तुमने हाल न पूछा घायल का
अपनी चोटों पर ख़ुद मालिश करता हूँ

छोड़ विरह के मरुथल में जाने वाले
ले तुझ पर गीतों की बारिश करता हूँ

उतना तेरी ओर निगोड़ा खिंचता है
जितनी अपने दिल पर बंदिश करता हूँ

दौलत-इज़्ज़त-शुहरत कब चाही मैंने
जोगी हूँ बस तेरी ख़्वाहिश करता हूँ
©खुरशीद खैराड़ी  जोधपुर ।

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

एक ताज़ा ग़ज़ल

सच्ची-झूठी सब तकरारें तू जाने
तेरी जीतें मेरी हारें तू जाने

मैंने काट दिए हैं सब ऊँचे परबत
नैतिकता की ये दीवारें तू जाने

तेरी नील चढ़ा ली है मैंने तन पर
तुझ पर किसकी चढ़ी फुहारें तू जाने

मैंने पतझर चुनकर तेरे जीवन को
अर्पित की हैं यार बहारें तू जाने

मेरे दिल के हर कोने में बस तू है
तेरे घर की यार  दरारें तू जाने

बैठ गया हूँ शीश झुकाकर चरणों में
चुप क्यों हैं तेरी तलवारें तू जाने
©खुरशीद  खैराड़ी जोधपुर।

एक सच्ची ग़ज़ल

मुझ पर तेरा रंग रहेगा
और न कोई संग रहेगा

मेरा सच्चा दीवानापन
देख ज़माना दंग रहेगा

इक दीवाने की आहों से
ध्यान तुम्हारा भंग रहेगा

तेरी उल्फ़त की मय पीकर
मनवा मस्त-मलंग रहेगा

मैं सब कुछ वारूँगा तुम पर
हाथ तुम्हारा तंग रहेगा

अंग लगाले चाहे जिसको
तू मेरा ही अंग रहेगा

ओल्ड य' धरती-अम्बर होंगे
प्यार हमारा यंग रहेगा

तेरी चाहत डोर रहेगी
जीवन एक पतंग रहेगा

तेरी यादों की थापों से
बजता दिल का चंग रहेगा
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

एक सुलगती ग़ज़ल

एक सुलगती ग़ज़ल---
122--122--122--122
सुकूँ का कोई सिल्सिला दे न पाया
जिसे पेड़ समझा हवा दे न पाया

हुआ दफ़्न किस्सा दिलों में हमारे
मैं क्या चाहता था वो क्या दे न पाया

ख़ताएँ गिनाता रहा मेरी लेकिन
सज़ा की कहा तो सज़ा दे न पाया

मिरे दिल का सागर सुखाकर गया जो
सुलगते लबों को घटा दे न पाया

मेरी क़ब्र पर जो बहाता है आँसू
मुझे ज़िंदगी की दुआ दे न पाया

मुझे आईना देखता है ब हैरत
मैं ख़ुद को मिरी ही अदा दे न पाया

पकड़ में मरज़ तो उसे आ गया था
बस इतना हुआ वो दवा दे न पाया

मुझे बेवफ़ा कह रहा है जो सादिक़
वफ़ा के बदल में वफ़ा दे न पाया

उजाले में 'खुरशीद' निकला वो ज़र्रा
अँधेरों में जो हौसला दे न पाया
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।
सादिक़--सत्यवादी

एक लाज़वाब ग़ज़ल

मेरे अज़ीज़ 'खुरशीद' भाई की धमाकेदार वापसी
2122--1212-- 22
चैन मेरा गया तुम्हारा क्या
तुमने मुड़कर मुझे पुकारा क्या

मैंने सारे हिसाब कर डाले
कर्ज़ तुमने भी कुछ उतारा क्या

आ गया फिर मुझे रुलाने वो
आँसुओं को हँसी पे वारा क्या

कोई क़ातिल मिलेगा तुमसा फिर
प्यार होगा मुझे दुबारा क्या

जानते हैं तो जान जाएं सब
मेरे गीतों में है इशारा क्या

ख़ाब था या कोई हक़ीक़त थी
साथ तुमने मिरे गुज़ारा क्या

पूछकर  मेरी हार से देखो
तुमने जीता है खेल सारा क्या

पड़ गई सिलवटें मिरे दिल पर
ज़ुल्फ़ को तुमने फिर सँवारा क्या

टिमटिमाते हो क्यों घटाओं में
तुम भी 'खुरशीद' हो सितारा क्या
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर 9413408422

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

एक परेशान ग़ज़ल

एक परेशान ग़ज़ल....
डोरे-ताँते, जंतर-मंतर करदे कोई
तेरी यादें तीतर-बीतर करदे कोई

भूल गया हूँ अपने तन को तेरा होकर
मुझको फिर से मेरे भीतर करदे कोई

चारागर ख़ुद आकर ज़ह्र मुझे दे जाए
मेरी हालात इतनी बदतर करदे कोई

तीर निगाहों का खेंचा है फिर ज़ालिम ने
मेरे दिल को आज कबूतर करदे कोई

तुझको मेरी सोच भी छूने से कतराए
तुझमें-मुझमें इतना अंतर करदे कोई

क्या हो गर ज़िंदा रहने की कसमें देकर
आती-जाती साँसें नश्तर करदे कोई

जीवन भर काँटों की सेज मिली है मुझको
अर्थी पर फूलों का बिस्तर करदे कोई
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।09413408422
चारागर = डॉक्टर (चिकित्सक)

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एक भोली ग़ज़ल

तू मुझको गर मिल जाता
स्वर्ग धरा पर मिल जाता

राधा-मोहन हम होते
कलि को द्वापर मिल जाता

तू मिल जाता चाँद मुझे
सारा अंबर मिल जाता

तेरी सेवा का मुझको
थोड़ा अवसर मिल जाता

जीवन के इस पोथे में
ढाई आखर मिल जाता

तेरे दिल की बस्ती में
मुझको भी घर मिल जाता

मरुथल से इस जीवन में
कोई निर्झर मिल जाता

प्रेम के सागर! तेरा जल
इक अँजुरी भर मिल जाता

बाट निहारी जीवन भर
ख़ुद ही आकर मिल जाता

तुझको पाकर हंसा को
मानसरोवर मिल जाता
©महावीर सिंह जोधपुर।