शनिवार, 20 जनवरी 2018

ताज़ा ग़ज़ल

मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है
मरज़ ठीक होगा नहीं लग रहा है

मेरी बेक़रारी हुई चैन उसका
ये सौदा तो महँगा नहीं लग रहा है

बहलने लगा है उधर दिल किसी का
इधर दिल किसी का नहीं लग रहा है

भुलाना है तो भूल जाओ मुझे तुम
मेरा तो इरादा नहीं लग रहा है

क़रीब इतना है वो कि सुनता है धड़कन
सदाएँ सुनेगा नहीं लग रहा है

तिरा प्यार ओढ़ा है जबसे बदन पर
कोई रंग फीका नहीं लग रहा है

शिकन तेरे माथे पे आई है क्यों कर
मेरा दिल तो टूटा नहीं लग रहा है

वो जो चाँद है-जैसे चेहरा है तेरा
फ़लक आइने सा नहीं लग रहा है?

कोई अज़नबी शह्र में खो गया हो
मेरा हाल ऐसा नहीं लग रहा है?

गले बारहा मिल रहा है सभी से
वो महफ़िल में तनहा नहीं लग रहा है

जो 'खुरशीद' लगता था इस आसमां पर
ज़मीं पर वो ज़र्रा नहीं लग रहा है
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।

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