शनिवार, 13 जनवरी 2018

मोह लगा रक्खा है

हमने भी किस दुश्वारी से मोह लगा रक्खा है
रेशम होकर चिंगारी से मोह लगा रक्खा है

चाहें तो अच्छे हो जाएं लेकिन चाह नहीं अब
दिल ने दिल की बीमारी से मोह लगा रक्खा है

काम तो इतने हैं जीवन भर साँस न लेने पाएं
फ़ुर्सत में हैं बेकारी से मोह लगा रक्खा है

कीड़े ही चाटेंगे उन कपड़ों की ज़रदोज़ी को
जिन कपड़ों ने अलमारी से मोह लगा रक्खा है

आवारा मन छोड़ आया है बस्ती सच्चाई की
कुछ सपनों की सरदारी से मोह लगा रक्खा है

इक तितली के सपनों की ख़ातिर मन के आँचल ने
काँटें चुनकर फुलवारी से मोह लगा रक्खा है

दूर उदासी को करने के सामां हैं पग-पग पर
फिर भी मन ने बेज़ारी से मोह लगा रक्खा है

मेरे अहसासों की तुझको क़द्र नहीं है कुछ भी
मैंने क्यों तेरी यारी से मोह लगा रक्खा है

चाँदी के पलड़े में मोल वफ़ा का तोले है वो
इस दिल ने इक व्यापारी से मोह लगा रक्खा है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
बेज़ारी-अप्रसन्नता
दुश्वारी-मुश्किल


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