बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

एक परेशान ग़ज़ल

एक परेशान ग़ज़ल....
डोरे-ताँते, जंतर-मंतर करदे कोई
तेरी यादें तीतर-बीतर करदे कोई

भूल गया हूँ अपने तन को तेरा होकर
मुझको फिर से मेरे भीतर करदे कोई

चारागर ख़ुद आकर ज़ह्र मुझे दे जाए
मेरी हालात इतनी बदतर करदे कोई

तीर निगाहों का खेंचा है फिर ज़ालिम ने
मेरे दिल को आज कबूतर करदे कोई

तुझको मेरी सोच भी छूने से कतराए
तुझमें-मुझमें इतना अंतर करदे कोई

क्या हो गर ज़िंदा रहने की कसमें देकर
आती-जाती साँसें नश्तर करदे कोई

जीवन भर काँटों की सेज मिली है मुझको
अर्थी पर फूलों का बिस्तर करदे कोई
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।09413408422
चारागर = डॉक्टर (चिकित्सक)

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

एक भोली ग़ज़ल

तू मुझको गर मिल जाता
स्वर्ग धरा पर मिल जाता

राधा-मोहन हम होते
कलि को द्वापर मिल जाता

तू मिल जाता चाँद मुझे
सारा अंबर मिल जाता

तेरी सेवा का मुझको
थोड़ा अवसर मिल जाता

जीवन के इस पोथे में
ढाई आखर मिल जाता

तेरे दिल की बस्ती में
मुझको भी घर मिल जाता

मरुथल से इस जीवन में
कोई निर्झर मिल जाता

प्रेम के सागर! तेरा जल
इक अँजुरी भर मिल जाता

बाट निहारी जीवन भर
ख़ुद ही आकर मिल जाता

तुझको पाकर हंसा को
मानसरोवर मिल जाता
©महावीर सिंह जोधपुर।

एक पावन सी ग़ज़ल

एक पावन भजन सी ग़ज़ल ......
इक पछतावा जीवन भर का रक्खा है
सपना तेरा अँखियन भर का रक्खा है

मुझको तेरी कितनी हसरत है फिर भी
तुझको तेरे साजन भर का रक्खा है

होठों की मुस्कान बनी कितनी यादें
कुछ यादों को अँसुवन भर का रक्खा है

मेरी आँखों में भी झाँक लिया होता
रूप सलोना दरपन भर का रक्खा है

बँगला-गाड़ी पाकर भी सुख दूर रहा
इक इस धन को निर्धन भर का रक्खा है

प्यास बुझाऊँ कैसे मीठे दरिया से
चातक दिल को सावन भर का रक्खा है

राधा संग बिराजे डाल कदम्बी पर
इक तुलसी को आँगन भर का रक्खा है

इक मीरा ने ठुकराया सुख महलों का
अपने मन को मोहन भर का रक्खा है

कितने ही चेहरे दिल को मेरे भाए
इक चेहरे को दर्शन भर का रक्खा है

घर में यार सजाया है कुछ काँटों को
कुछ फूलो को उपवन भर का रक्खा है

पीपल जैसा पावन माना है इसको
प्यार तुम्हारा पूजन भर का रक्खा है
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

एक दिल की ग़ज़ल

दीवाना दिल बात सयानी कहता है
मुस्कानों में आँख का पानी कहता है

नाज़ कराती है कितना दिल की दौलत भी
एक फ़क़ीरा तुझको रानी कहता है

ओ शहज़ादी! तुझको भाएगा कैसे वो
दास कबीरा की जो बानी कहता है

प्यास लगे तो आँसू पीता है शायर
भूख लगे तो बस गुड़-धानी कहता है

सुनते-सुनते आँख लगी जग वालों की
दुखिया अपनी राम कहानी कहता है

नूर सवेरे का आँखों को बतलाकर
वो ज़ुल्फ़ों को शाम सुहानी कहता है

उसके दिल में कितना दर्द जमा होगा
हँसती ग़ज़लें यार ज़ुबानी कहता है

सच बतला 'खुरशीद' हुनर कैसे सिखा
रोते-रोते  बात लुभानी कहता है
© 'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर।9413408422

भाई दूज की ग़ज़ल

मेरा बीरा मेरा चंदा रहे नीका
यही कहता है भाईदूज का टीका

निभाने प्रीत आ जाना मिरे भैया
ए! राजा बिन तिरे सब कुछ लगे फ़ीका

मैं बाबा से छुपाऊँ लाख ग़म अपना
छुपेगा हाल तुझसे क्या मिरे जी का

लिपाऊँ चौक केसर और चंदन से
तू आए तो जलाऊँ दीप मैं घी का
 
बलाएँ लूँ  दुआएँ दूँ  तुझे लाखों
अमर बनकर रहे सिन्दूर भाभी का
भाई-बहन के अमर त्यौहार भाई-दूज की ढेरों शुभकामनाएँ।
© महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

एक ग़ज़ल ---लेकर आया

नेह सबूतों की बैसाखी लेकर आया
जग हँसता है प्यार गवाही लेकर आया

यार गले से लगकर भी दिल में दूरी है
मिलने की तू चाहत आधी लेकर आया

सुनलो दिल पर अपने ताला जड़ने वालों
मैं ग़ज़लों में अपनी, चाबी लेकर आया

ख़ाब उजाले का आधा ही रक्खा उसने
दीपक लाया साथ धुँआ भी लेकर आया

ग़म तो भूला होश नहीं लेकिन अब ख़ुद का
कैसी आफ़त साथ शराबी लेकर आया

पागल कहती है दुनिया 'खुरशीद' तुझे क्यों
इक तू ही तो अक़्ल ज़रा सी लेकर आया
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर 9413408422

एक मासूम ग़ज़ल

एक प्यारी सी मासूम ग़ज़ल
अश्कों से भीगी दीवाने की पाती है
पढ़कर दीवानों की आँखें भर आती है

गीत तुम्हारे नाम लिखे हैं मैंने सारे
मेरी सारी ग़ज़लें तुमसे बतियाती है

मैं तुमको क्या हाल सुनाऊँ अपने जी का
मेरे दिल का दर्द सुनो कोयल गाती है

तुमने गहनों-लत्तों से तोला उल्फ़त को
प्रीत कहाँ कंकर-पत्थर से तुल पाती है

मेरा तुमसे जो रिश्ता है, इस दुनिया को
चाँद-चकोरे की जोड़ी कुछ समझाती है

नील-गगन में बनकर सूरज तुम चमको अब
मेरा जीवन तो बुझती सी इक बाती है

मेरी आँखों में जगमग करता है जो सच
यार तुम्हारी आँखें उसको झुठलाती है

महफ़िल-महफ़िल हँसता-गाता बंजारा था
इस दिल को तनहाई अब कितना भाती है
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

एक ग़ज़ल-रामा शामा

गोवर्धन एक ग़ज़ल....
माना ग़म का परबत काफ़ी भारी है
एक हँसी की लघु-उँगली गिरधारी है

तकलीफ़ों की बारिश बरसे कितनी भी
हिम्मत के इक गोवर्धन से हारी है

रूठे कोई राजा मन के गोकुल से
गोवर्धन के नीचे नगरी सारी है

लज्जित है भीतर अन्नकूटों की शोभा
मंदिर के द्वारे पर भूख हमारी है

कंस अभी तक है मथुरा की गद्दी पर
गाय रियाया हर युग में दुखियारी है

खार घुला है मिसरी जैसे रिश्तों में
आज मिठाई दीवाली की खारी है

नफ़रत भूलो प्यार बसाओ इस दिल में
रामा-शामा पर यह अर्ज़ हमारी है
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

रूप चवदस के दोहे

रूप-चौदस के 14(चौदह) दोहे....
मन-आँगन में माँढ़ना, चटकीले शुभ रंग ।
रंगोली को देखकर, लोग हुए हैं दंग ।।...1

चौक पुराया प्रेम से, प्रेम जलाया दीप ।
चमका मोती प्रेम का, नैन हमारे सीप ।।...2

बालों को रेशम किया, घूँघर ली है डाल ।
वेणी सुन्दर गूँथकर, चाँद सजाया भाल ।।...3

तीखी भौहें यूँ तनी, जैसे काम-कमान ।
रेखा काजल की चली, करने शर-संधान ।।...4

माथे पर टिकला सजा, दमका तुमरा प्यार ।
सीने से साजन लगे, बनकर तुम गलहार ।।...5

रूप सजाया चाव से, आन निहारो पीव ।
साजन तेरी राह में, अटका मेरा जीव ।।...6

उबटन मलकर धूप का, दमकी गौरी देह ।
जगमग मेरे रूप की, साजन तेरा नेह ।।...7

प्रेम चुनरिया ओढ़ ली, कर सोलह सिणगार ।
गहना मेरा प्रेम है, पहनूँ तुझको यार ।।...8

चवदस की इस रात में, जगमग मेरा रूप ।
झीना घूँघट ओढ़कर , छितराई है धूप ।।...9

लाली होठों पर सजी, गालों पर है लाज ।
नथनी तेरे नाम की, चमकी कितनी आज ।।...10

रूप सजाकर मैं खड़ी, देख रही बाज़ार ।
मोल मिले तो मोल लूँ, साजन तेरा प्यार ।।...11

बाज़ारों में धूम है, गलियों में है नूर ।
सज-धज मेरी देखकर, लोग रहे हैं घूर ।।...12

'मैं' को अपने झाड़कर, पोता तेरा नेह ।
झूमर टाँगी प्रीत की, चमका मन का गेह ।।...13

प्रेम बिना जीवन नरक, प्रेम स्वर्ग का धाम ।
प्रेम उजाला भोर का, प्रेम सुहानी शाम ।।...14
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर 9413408422
आप सभी को रूप-चौदस (विश्व-सौंदर्य दिवस) की शुभकामनाएँ। आपके जीवन में रूप और सौंदर्य बना रहे और जीवन मधुर मधुमास हो जाए।
विनीत
महावीर सिंह और सभी स्नेहिल परिजन।

धन तेरस के दोहे

धन-तेरस के 13 तेरह दोहे........
खोदा मन की खान को, यार बजाकर ढोल ।
गहरे उतरा तब मिला, प्रेम-रतन अनमोल ।।...1

पाया हीरा प्रेम का, गहरे उतरा ठेठ ।
आज जगत में कौन है, मुझसा धन्ना सेठ ।।...2

धन तेरस की भोर में, चमकी मन की खान ।
प्रेम-रतन धन पा गई, मैं निर्धन नादान ।।...3

'मैं' की मिट्टी छानकर, टाले कंकर मोह ।
तब जाकर मुझको मिली, लाल-रतन की टोह ।।...4

सोना सुख का वार दे, नेह-नगद का ढेर ।
चाँदी कितनी चैन की, बाँटे प्रेम-कुबेर ।।...5

मथना मन के सिंधु को, पाल अमृत की आस ।
हाथ लगेगा प्रेम-घट, बुझ जाएगी प्यास ।।...6

धनवन्तरि है प्रेम ही, मेटे सारे रोग ।
प्रेम-विहीना देखलो, रोगी कितने लोग ।।...7

बढ़कर चारों वेद से, प्रेम पाँचवा वेद ।
पड़कर तेरे प्रेम में, हुआ उजागर भेद ।।...8

सच्चा आयुर्वेद है, हर औषध का सार ।
प्रेमासव सब पीजिए, सेहत का भंडार ।।...9

सुख-सुविधाओं का लगे, उस घर में अंबार ।
दारिद्रय सब दूर हो, जिस घर में हो प्यार ।।...10

गहना-लत्ता प्रेम है, प्रेम सकल धन-धान ।
प्रेम बिना निर्धन सभी, प्रेम सुखों की खान ।।...11

मन मोती सा हो अगर, निर्धन के भी पास ।
राजा वो नर हो गया, दुनिया उसकी दास ।।...12

तेरस पावन वार है, कार्तिक पावन माह ।
मिल जाए जब प्रेम-धन, बढ़ जाए उत्साह ।।...13
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर 9413408422
आपको और आपके परिवार को धन-धान्य और आरोग्य के पर्व धन- तेरस की प्रेममयी शुभकामनाएँ।
विनीत
महावीर सिंह और स्नेहिल परिजन।

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

ग़ज़ल- -आपका हुस्न

22-1212--1122--1212
ज़ुल्फ़ें य' चाँदनी में नहाईं हुई लगे
आँखों को मय अदा की पिलाई हुई लगे

कलियाँ गुलाब की है लबों पर सजी हुई
लाली छितिज की इनमें समाई हुई लगे

रेशम पे हो ज़री का कसीदा किया हुआ
माथे पे कुछ लटें यूँ सजाई हुई लगे

तिरछी कमान सी हैं य' भौहें तनी हुई
गालों पे कैरियाँ ये लजाई हुई लगे

गर्दन पे आपकी जो है सिलवट महीन सी
तलवार मेरे दिल पे उठाई हुई लगे

शायर के ख़ाब सी मिरी जाँ तुम हसीन हो
सूरत ग़ज़ल ख़ुदा की बनाई हुई लगे

उजला जवान हुस्न है पूनम के चाँद सा
मंदिर में कोई जोत जलाई हुई लगे
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर। 09413408422

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

एक मासूम गज़ल

एक प्यारी सी मासूम ग़ज़ल
अश्कों से भीगी दीवाने की पाती है
पढ़कर दीवानों की आँखें भर आती है

गीत तुम्हारे नाम लिखे हैं मैंने सारे
मेरी सारी ग़ज़लें तुमसे बतियाती है

मैं तुमको क्या हाल सुनाऊँ अपने जी का
मेरे दिल का दर्द सुनो कोयल गाती है 

तुमने गहनों-लत्तों से तोला उल्फ़त को 
प्रीत कहाँ कंकर-पत्थर से तुल पाती है

मेरा तुमसे जो रिश्ता है, इस दुनिया को 
चाँद-चकोरे की जोड़ी कुछ समझाती है 

नील-गगन में बनकर सूरज तुम चमको अब
मेरा जीवन तो बुझती सी इक बाती है 

मेरी आँखों में जगमग करता है जो सच
यार तुम्हारी आँखें उसको झुठलाती है 

महफ़िल-महफ़िल हँसता-गाता बंजारा था
इस दिल को तनहाई अब कितना भाती है 
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422