गुरुवार, 14 अगस्त 2014
प्रतिष्टित 'लफ्ज़' पोर्टल की तरही १९ में पोस्ट एक ग़ज़ल 'ऐसे नाराज़ न हो मेरे मसीहा मुझसे ' अगस्त २०१४
ऐसे
नाराज़ न हो मेरे मसीहा मुझसे
दर्दे -उल्फ़त
न सहा जायेगा तन्हा मुझसे
सारी
दुनिया के सितम एक अकेले दिल पर
इक
मुहब्बत का गुनह ही तो हुआ था मुझसे
आँसुओं
की ये घटाएं य’ जिगर की ताबिश
जिंदा
रहने के लिए मेरा उलझना मुझसे
मैं बुरा
हूं य’ हक़ीकत है अज़ीज़ों लेकिन
ढूंढ कर
भी तो दिखाओ कोई अच्छा मुझसे
अपनी
तस्वीर को देखा तो हुई हैरानी
अज़नबी हो
गया कितना मेरा चेहरा मुझसे
ख़ुदफ़रोशी
पे’ जो उतरा तो खुली सच्चाई
कोई
सामान कहाँ अब रहा सस्ता मुझसे
मेरा
सरमाया-ए-फ़न है य’ तसव्वुर तेरा
वरना
होती कोई महफ़िल भला रख्शाँ मुझसे
तेरी
यादों के सनोबर मेरी राहों में थे
वरना ग़म
का य’ सफ़र शाद हो कटता मुझसे
सब्र की
इंतिहा है अब्र बरस जा अब तो
सूख जाये
न कहीं कुछ गुले-सहरा मुझसे
मेरे हक़ में मेरा दिल ही न गवाही देगा
‘साहिबों उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’
शोला-ए-हिज्र को पिंदार के दामन में रख
सीख लो ख़ाब मिलन के भी सजाना मुझसे
जर्फ़ देखो की अज़ल से है तमन्ना जिसकी
ताकयामत वो रहेगा न शनासा मुझसे
नाम ‘खुरशीद’ रखा है तो जलाऊँगा दिल
देखा जायेगा न हरगिज य’ अँधेरा मुझसे
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
'साहित्य रागिनी के मई २०१४ अंक में शाया हुई एक ग़ज़ल 'दोस्ती का यही सिला दोगे ...
दोस्ती का यही सिला दोगे
हाल पर मेरे मुस्कुरा दोगे
क्या ख़बर थी क़रीब आकर तुम
दरमियां दूरियाँ बढ़ा दोगे
शहर के हाल पर तरस खाओ
क्या इसे दश्त ही बना दोगे
मैं मुहब्बत के गीत गाता हूँ
इस गुनह की मुझे सज़ा दोगे
वो भटकता हुआ मुसाफ़िर है
राहबर उसको तुम बना दोगे
चाँद के साथ जागकर शब भर
रोग जी को नया लगा दोगे
आप ‘खुरशीद’ जी ग़ज़ल गाकर
नूर संसार को नया दोगे
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
'साहित्य रागिनी ' के मई २०१४ अंक में शाया हुई एक ग़ज़ल 'मुझे मंजूर है हर फ़ैसला अब ..'
मुझे मंज़ूर है हर फ़ैसला अब
मुहब्बत है गुनह तो हो सज़ा अब
मनाफ़िज़ ये मरासिम की रिदा के
कहेंगे हाले-दिल को बरमला अब
मुख़ातिब है अना से आगही तो
मगर सुनती कहाँ है कुछ अना अब
डुबोया है भँवर में नाख़ुदा ने
करेगा क्या ख़ुदा भी मोजिज़ा अब
किसी के पास जब दिल ही नहीं है
सुनेगा कौन दिल की इल्तिजा अब
सियासतदां दिलों को बाँटते हैं
दिखानी होगी हमको एकता अब
जलाता कौन है दिल को मुसल्सल
बस इक ‘खुरशीद’ है बावला अब
मनाफ़िज़-छेद मरासिम-रिश्ते रिदा-चादर बरमला-सबके सामने \मुँह पर
अना-मैं आगही-समझ नाख़ुदा-कर्णधार मोजिज़ा-चमत्कार
मुसल्सल-लगातार
‘खुरशीद’
खैराड़ी जोधपुर (राजस्थान)०९४१३४०८४२२ समाज कल्याण विभाग की पत्रिका 'समाज कल्याण ' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'आँखों में इक ख़्वाब सुहाना...' मई २०१४
आँखों में इक ख़्वाब सुहाना बरसों से है
पुरखों का इक गाँव पुराना बरसों से है
जिसने देखा है मेरे परदादा तक को
आँगन में इक नीम सुहाना बरसों से है
इमरत जैसा मीठा पानी एक कुएँ का
मोती का इक खेत खज़ाना बरसों से है
इक पगडण्डी साखी है इक पूरे युग की
हम लोगों का आना जाना बरसों से है
ठाकुर जी की आले में इक दीप सनातन
साँझ ढले जिसका जग जाना बरसों से है
दादी माँ के बुगसे में इक झबला टोपी
मेरे बेटे का नज़राना बरसों से है
पीढ़ी दर पीढ़ी यादों का एक कनागत
खपरैलों पर इक कौवा काना बरसों से है
काका-मामा फूफा मौसी देवर ननदी
रिश्तों का यह ताना बाना बरसों से है
जिसके होठों पर है जंग लगी इक चुप्पी
जर्जर घर में इक तहखाना बरसों से है
तुलसी-चौरा पीपल-पूजा जल-चरणामृत
कह लो तुम चाहे बचकाना बरसों से
है
ठाकुर
द्वारे की चौकी पर खोल जटाएं
तपधारी
इक बरगद दाना बरसों से है
पनघट
पर जमघट घूँघट ओढ़े चाँदों का
खुसरो
का इक लोक तराना बरसों से है
शाहिद
इस अंबर पर है खुरशीद अज़ल से
कायम
अब तक एक घराना बरसों से है
आ.अशोक अंजुम जी की 'अभिनव प्रयास' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'कागज की एक नाव बनाऊं ' जून २०१४
काग़ज़ की इक नाव बनाऊं जी करता है
सावन में बच्चा बन जाऊं जी करता है
छप्पन भोग सजे हैं मूरत क्या जीमेगी
कुछ भूखों की भूख मिटाऊं जी करता है
जिसके चेहरे पर कालिख पोते सूरज भी
उस बस्ती में दीप जलाऊं जी करता है
महफ़िल महफ़िल हँसता गाता बंजारा हूं
चोरी चुपके नीर बहाऊं जी करता है
घर से दफ़्तर दफ़्तर से घर तक सिमटा हूं
मैदानों में दौड़ लगाऊं जी करता है
खिड़की यादों की खोलूं जब दिल बेकल हो
पहरों तक तुझसे बतियाऊं जी करता है
माज़ी की गुल्लक में खनके यादें तेरी
जीवन भर सिक्के खनकाऊं जी करता है
बँगले बँगले खुशबू कैदी है गमलों में
सहराओं में बाग़ सजाऊं जी करता है
कोठे के जीने उतरूं गलियों में जाऊं
औसत जन की पीड़ा गाऊं जी करता है
प्रतिष्टित 'लफ्ज़' पोर्टल की तरही १८ में पोस्ट एक भजन-ग़ज़ल 'कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है ' जून २०१४
कृपा का आपकी जो सहारा हो गया है
भँवर से पार मेरा सफ़ीना हो गया है
अहिल्या को भी तारा अजामिल को भी तारा
मुझे भी तार दोगे भरोसा हो गया है
गरल हर साँस है अब विषैला नाग हर पल
विरह कैलाश जीवन शिवाला हो गया है
गरज़ की खाद पाकर मरासिम बर्गे-गुल सा
मुसल्सल चुभ रहा है नुकीला हो गया है
सगुण है रूप तेरा अगुण है प्यार मेरा
कभी मीरा कभी दिल कबीरा हो गया है
य’ लौ सा जगमगाता सुनहरा जिस्म तेरा
उमंगों से भरा दिल पतंगा हो गया है
ग़रीबी-भूख-कर्जा घिरा है गाँव मेरा
खुला मैदान था जो तिराहा हो गया है
न कर अफ़सोस इसका ज़माना क्या कहेगा
नये हैं हम ज़माना पुराना हो गया है
मुझे रघुनाथ जी की व्यवस्था पर यकीं है
था जीवन एक पत्थर शिकारा हो गया है
ग़ज़ल फिर गुनगुनाने लगे हैं दिलजले सब
ग़मों को भूलने का वसीला हो गया है
उफ़ुक पर शान से फिर हुआ ‘खुरशीद’ काबिज़
‘हुई
फिर हार तम की सवेरा हो
गया है ‘
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
प्रतिष्टित 'लफ्ज़' पोर्टल की तरही १८ में शाया एक ग़ज़ल 'सियासतदां हमारा मसीहा हो ..' जून २०१४
सियासतदाँ
हमारा मसीहा हो गया है
गरीबी
का हमारी तमाशा हो गया है
अज़ल
से देखता हूं यही सपना सुहाना
शब-ए
-ग़म ढल गई है उजाला हो गया है
मरासिम
के वसन में मनाफ़िज़ हैं हज़ारों
कठिन
उरयानगी को छुपाना हो गया है
तुझे
छूकर नसों में रवाँ है बर्क़ सा क्या
पिघलकर
जोश मन का ,पसीना
हो गया है
तुझे
सोचूं तो भरने लगे है चौकड़ी सी
तसव्वुर
दिल के बन में गज़ाला हो गया है
जिधर
भी देखता हूं तुझे ही देखता हूं
कोई
मुझ को बतादे मुझे क्या हो गया है
अनय
के सामने मैं झुकाऊंगा नहीं सिर
दिनोंदिन
और पक्का इरादा हो गया है
हया
से सच सिमटकर कहाँ जाये बतादो
हबीबों
झूठ उरयाँ सरापा हो गया है
ज़बीं
पर गाँव की क्यूं लिखी है बदनसीबी
दुपहरी
में भी हर सू अँधेरा हो गया है
बड़े
मासूम हैं जी मेरे देहात वासी
इन्हें
फिर राहज़न पर भरोसा हो गया है
मुक़द्दस
है ग़ज़ल तू मुनव्वर है ग़ज़ल तू
तेरे
छूते ही ज़र्रा सितारा हो गया है
उफ़ुक़
के गाल पर फिर रखे 'खुरशीद' ने लब
हया
का रंग बिखरा सवेरा हो गया है
'खुरशीद'खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
बोधि प्रकाशन की 'उत्पल' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'मीरो ग़ालिब की रिवायत निभायेंगे ....' जनवरी २०१४
मीरो-ग़ालिब की रिवायत निभायेंगे
हक़बयानी ताकयामत निभायेंगे
पूछती है तेग़ थक कर सितमगर से
कब तलक सरकश अदावत निभायेंगे
जीते जी रंजिश रखो चाहे जितनी तुम
मरते दम तक हम मुहब्बत निभायेंगे
क्यूं चलेंगे हम कहे पर ज़माने के
हम हमारी ही इबारत निभायेंगे
हम ग़रीबों से फ़क़त वोट लेना था
क़ौल क्या अहले-सियासत निभायेंगे
आज के इस दौर में है बड़ा मुश्किल
कैसे करके वो शराफ़त निभायेंगे
एक दिन ‘खुरशीद’ जी भी बिकेंगे ही
दाम बढ़ने तक तिजारत निभायेंगे
सादर आभार ‘उत्पल’ बोधि प्रकाशन
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
आ. भानुमित्र जी की 'ग़ज़ल गरिमा ' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'ज़रा सी बारिश '
ज़रा सी बारिश शहर का नक्शा बदल देती है
किसी की मंज़िल किसी का रस्ता बदल देती है
हथेली सब इक सरीखी ले कर वहाँ से आए
अमीरी किस्मत ग़रीबी रेखा बदल देती है
सहम जाते हैं अजी सुनकर राम की चर्चा अब
सियासत हर चीज का माईना बदल देती है
कहीं रोटी के लिए गहने लोग गिरवी रखते
कहीं पत्नी जन्मदिन पर गहना बदल देती है
ज़रा सी दूरी शहर से शमशान तक की यारों
नजरिया ही आदमी का कितना बदल देती है
सँवर कर आने लगा है ‘खुर्शीद’ भी दफ़्तर में
किसी की नज़रें किसी का हुलिया बदल देती है
सादर आभार ‘ग़ज़ल गरिमा’
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
आ. गिरिराजशरण अग्रवाल जी की पत्रिका 'शोध दिशा ' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'समझे फिर ......' अप्रेल २०१४
ख़ुद को कितना निर्बल समझे फिर
हम धागे को साँकल समझे फिर
प्यास छलक आयी थी आँखों में
लोग धुएँ को बादल समझे फिर
अब तो केवल धँसते जाना है
दलदल को हम साहिल समझे फिर
सावन के अंधें हैं कुछ सपने
लो काँटे को कोंपल समझे फिर
तोड़ दिया प्यार भरे दिल को
तुम सोने को पीतल समझे फिर
साथ दिया फिर सच का मैंने भी
लोग मुझे भी पागल समझे फिर
राह्जनों ने फिर लूटा हमको
हम रस्ते को मंज़िल समझे फिर
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर (राज.) ०९४१३४०८४२२
आ.गिरिराजशरण अग्रवाल जी की पत्रिका 'शोध दिशा ' के अप्रेल २०१४ अंक में शामिल एक ग़ज़ल 'रघुवर जी ....'
धूप कहीं पर और कहीं पर शीतल छाया रघुवर जी
दुख सुख के दो रंगों से क्या खेल रचाया रघुवर जी
अंत समय पर भेद खुला यह बेगानी थी वो माया
जिस गठरी का जीवन भर बोझ उठाया रघुवर जी
पाँव दुपहरी में जो छूता था बनकर अनुचर तन का
साँझ ढली तो वो साया भी पास न आया रघुवर जी
प्यार वफ़ा की बातें करना नादानी है इस युग में
हमने दीवाने दिल को कितना समझाया रघुवर जी
खाली हाथ यहाँ पर आना, खाली हाथ चले जाना
जग के इस मेले में क्या खोया क्या पाया रघुवर जी
मतलब के सब नाते-रिश्ते अय्यारी है अपनापन
कौन सगा है इस दुनिया में कौन पराया रघुवर जी
गम इतना है यदि रोऊँ तो सारा जीवन गल जाये
गम का रोना छोड़ा मैंने गम को गाया रघुवर जी
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर (राज.) ०९४१३४०८४२२
रविवार, 4 मई 2014
अदबी दहलीज़ के ग़ज़ल विशेषांक अप्रैल २०१४ में शाया हुई एक ग़ज़ल 'धुआं ही धुआं है जिधर देखता हूं '
धुआँ ही धुआँ है
जिधर देखता हूं
सुलगता सबों का
जिगर देखता हूं
लगे अज़नबी से ये
दीवारोदर क्यूं
बड़ी देर से अपना घर
देखता हूं
सिवा मुझ नकारा बशर
के अज़ीज़ों
हर इक आदमी पुर
हुनर देखता हूं
शनासा कोई हो मेरा
भीड़ में इस
सभी अज़नबी है मगर
देखता हूं
कहाँ देवता है बताओ
मुझे तुम
जिधर देखता हूं हजर
देखता हूं
उछाले शजर पर यहाँ
संग जिसने
उसी की रिदा में
समर देखता हूं
क्यूं अब हाल
‘खुरशीद’ का पूंछते हो
मैं दुनिया उसे
छोड़कर देखता हूं
हजर=पत्थर ,शजर=पेड़
,रिदा=चादर ,समर=फल
अदबी दहलीज़ के ग़ज़ल विशेषांक में शाया हुई एक ग़ज़ल 'ज़ख्म देगा वही दवा देगा 'अप्रेल २०१४
ज़ख्म देगा वही दवा देगा
बेवफ़ा दर्द फिर नया देगा
बाइरादा कदम बढ़ाना तुम
देखना कोह रास्ता देगा
ठोकरों का ये सिल्सिला तुमको
देखना दौड़ना सिखा देगा
भूख को वो बनाएगा मुद्दा
खेत पहले सभी जला देगा
पढ़ना ‘खुरशीद’ की ग़ज़ल ग़म में
उसका हर शेर हौंसला देगा
बुधवार, 9 अप्रैल 2014
प्रतिष्टित पत्रिका 'पुष्पवाटिका' के अप्रेल २०१४ अंक में शाया हुई ग़ज़ल 'मुझे अबला समझना मत......
मुझे अबला समझना मत मैं दुर्गा हूं भवानी हूं
जिसे पूजा है वेदों ने मैं वो ताकत पुरानी हूं
मेरे ही नाम से है नाम तेरा भी ज़माने में
कभी राधा सी जोगन हूं कभी मीरा दीवानी हूं
नहीं मूरख कोई तुझसा मुझे दासी समझता है
तू राजा है मेरे दिल का मैं तेरे दिल की रानी हूं
मेरी जुल्फ़ें ग़मों की धूप में है शामियाने सी
ख़ुशी का मैं ठिकाना हूं सुखों की राजधानी हूं
गुलाबों को चमन की शान कहते हो मगर सुन लो
महकता है मुझी से घर जुही हूं रातरानी हूं
मुझे क्यूं कोख में ही मौत की सौगात देते हो
मेरी ही कोख में दुनिया पली मैं जिंदगानी हूं
न बुर्क़े में छुपूंगी अब न घूंघट में लजाऊंगी
ख़ुदा के नूर का जलवा हूं जादू आसमानी हूं
बहन बनकर बलाएं ले रही हूं मैं तेरी बीरा
मैं ही अम्मा मैं ही बीबी मैं ही बिटिया सयानी हूं
मुझे जूती किसी ने पाँव की कहकर पुकारा है
अरे मर्दों मुझे झुककर करो सज्दा ज़नानी हूं
तेरे बिन मैं अधूरी हूं मेरे बिन तू अधुरा है
तेरी साझी तेरी साथी हर इक युग की कहानी हूं
ये महँदी बिंदिया कुमकुम ये काजल चूड़ियाँ पायल
सुहागन हूं तेरे सौभाग्य की सुन्दर निशानी हूं
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