गुरुवार, 14 अगस्त 2014

आ.अशोक अंजुम जी की 'अभिनव प्रयास' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'कागज की एक नाव बनाऊं ' जून २०१४

काग़ज़ की इक नाव बनाऊं जी करता है
सावन में बच्चा बन जाऊं जी करता है

छप्पन भोग सजे हैं मूरत क्या जीमेगी
कुछ भूखों की भूख मिटाऊं जी करता है

जिसके चेहरे पर कालिख पोते सूरज भी
उस बस्ती में दीप जलाऊं जी करता है

महफ़िल महफ़िल हँसता गाता बंजारा हूं
चोरी चुपके नीर बहाऊं जी करता है

घर से दफ़्तर दफ़्तर से घर तक सिमटा हूं
मैदानों में दौड़ लगाऊं जी करता है

खिड़की यादों की खोलूं जब दिल बेकल हो
पहरों तक तुझसे बतियाऊं जी करता है

माज़ी की गुल्लक में खनके यादें तेरी
जीवन भर सिक्के खनकाऊं जी करता है

बँगले बँगले खुशबू कैदी है गमलों में
सहराओं में बाग़ सजाऊं जी करता है

कोठे के जीने उतरूं गलियों में जाऊं
औसत जन की पीड़ा गाऊं जी करता है 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें