गुरुवार, 14 अगस्त 2014

'साहित्य रागिनी के मई २०१४ अंक में शाया हुई एक ग़ज़ल 'दोस्ती का यही सिला दोगे ...

दोस्ती का यही सिला दोगे
हाल पर मेरे मुस्कुरा दोगे

क्या ख़बर थी क़रीब आकर तुम
दरमियां दूरियाँ बढ़ा दोगे

शहर के हाल पर तरस खाओ
क्या इसे दश्त ही बना दोगे

मैं मुहब्बत के गीत गाता हूँ
इस गुनह की मुझे सज़ा दोगे

वो भटकता हुआ मुसाफ़िर है
राहबर उसको तुम बना दोगे

चाँद के साथ जागकर शब भर
रोग जी को नया लगा दोगे

आप ‘खुरशीद’ जी ग़ज़ल गाकर
नूर संसार को नया दोगे


‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२ 

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