गुरुवार, 14 अगस्त 2014

प्रतिष्टित 'लफ्ज़' पोर्टल की तरही १८ में शाया एक ग़ज़ल 'सियासतदां हमारा मसीहा हो ..' जून २०१४

सियासतदाँ हमारा मसीहा हो गया है 
गरीबी का हमारी तमाशा हो गया है 

अज़ल से देखता हूं यही सपना सुहाना 
शब-ए -ग़म ढल गई है उजाला हो गया है 

मरासिम के वसन में मनाफ़िज़ हैं हज़ारों 
कठिन उरयानगी को छुपाना हो गया है

तुझे छूकर नसों में रवाँ है बर्क़ सा क्या 
पिघलकर जोश मन का ,पसीना  हो गया है

तुझे सोचूं तो भरने लगे है चौकड़ी सी 
तसव्वुर दिल के बन में गज़ाला हो गया है

जिधर भी देखता हूं तुझे ही देखता हूं 
कोई मुझ को बतादे मुझे क्या हो गया है

अनय के सामने मैं झुकाऊंगा नहीं सिर 
दिनोंदिन और पक्का इरादा हो गया है

हया से सच सिमटकर कहाँ जाये बतादो 
हबीबों झूठ उरयाँ सरापा हो गया है

ज़बीं पर गाँव की क्यूं लिखी है बदनसीबी 
दुपहरी में भी हर सू अँधेरा हो गया है 

बड़े मासूम हैं जी मेरे देहात वासी 
इन्हें फिर राहज़न पर भरोसा हो गया है

मुक़द्दस है ग़ज़ल तू मुनव्वर है ग़ज़ल तू 
तेरे छूते ही ज़र्रा सितारा हो गया है 

उफ़ुक़ के गाल पर फिर  रखे 'खुरशीद' ने लब 
हया का रंग बिखरा  सवेरा  हो गया है


'खुरशीद'खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२ 

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