धूप कहीं पर और कहीं पर शीतल छाया रघुवर जी
दुख सुख के दो रंगों से क्या खेल रचाया रघुवर जी
अंत समय पर भेद खुला यह बेगानी थी वो माया
जिस गठरी का जीवन भर बोझ उठाया रघुवर जी
पाँव दुपहरी में जो छूता था बनकर अनुचर तन का
साँझ ढली तो वो साया भी पास न आया रघुवर जी
प्यार वफ़ा की बातें करना नादानी है इस युग में
हमने दीवाने दिल को कितना समझाया रघुवर जी
खाली हाथ यहाँ पर आना, खाली हाथ चले जाना
जग के इस मेले में क्या खोया क्या पाया रघुवर जी
मतलब के सब नाते-रिश्ते अय्यारी है अपनापन
कौन सगा है इस दुनिया में कौन पराया रघुवर जी
गम इतना है यदि रोऊँ तो सारा जीवन गल जाये
गम का रोना छोड़ा मैंने गम को गाया रघुवर जी
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर (राज.) ०९४१३४०८४२२
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