ख़ुद को कितना निर्बल समझे फिर
हम धागे को साँकल समझे फिर
प्यास छलक आयी थी आँखों में
लोग धुएँ को बादल समझे फिर
अब तो केवल धँसते जाना है
दलदल को हम साहिल समझे फिर
सावन के अंधें हैं कुछ सपने
लो काँटे को कोंपल समझे फिर
तोड़ दिया प्यार भरे दिल को
तुम सोने को पीतल समझे फिर
साथ दिया फिर सच का मैंने भी
लोग मुझे भी पागल समझे फिर
राह्जनों ने फिर लूटा हमको
हम रस्ते को मंज़िल समझे फिर
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर (राज.) ०९४१३४०८४२२
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें