गुरुवार, 14 अगस्त 2014

आ. भानुमित्र जी की 'ग़ज़ल गरिमा ' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'ज़रा सी बारिश '

ज़रा सी बारिश शहर का नक्शा बदल देती है
किसी की मंज़िल किसी का रस्ता बदल देती है

हथेली सब इक सरीखी ले कर वहाँ से आए
अमीरी किस्मत ग़रीबी रेखा बदल देती है

सहम जाते हैं अजी सुनकर राम की चर्चा अब
सियासत हर चीज का माईना बदल देती है

कहीं रोटी के लिए गहने लोग गिरवी रखते
कहीं पत्नी जन्मदिन पर गहना बदल देती है

ज़रा सी दूरी शहर से शमशान तक की यारों
नजरिया ही आदमी का कितना बदल देती है

सँवर कर आने लगा है ‘खुर्शीद’ भी दफ़्तर में
किसी की नज़रें किसी का हुलिया बदल देती है

सादर आभार ‘ग़ज़ल गरिमा’

‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२ 

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