मीरो-ग़ालिब की रिवायत निभायेंगे
हक़बयानी ताकयामत निभायेंगे
पूछती है तेग़ थक कर सितमगर से
कब तलक सरकश अदावत निभायेंगे
जीते जी रंजिश रखो चाहे जितनी तुम
मरते दम तक हम मुहब्बत निभायेंगे
क्यूं चलेंगे हम कहे पर ज़माने के
हम हमारी ही इबारत निभायेंगे
हम ग़रीबों से फ़क़त वोट लेना था
क़ौल क्या अहले-सियासत निभायेंगे
आज के इस दौर में है बड़ा मुश्किल
कैसे करके वो शराफ़त निभायेंगे
एक दिन ‘खुरशीद’ जी भी बिकेंगे ही
दाम बढ़ने तक तिजारत निभायेंगे
सादर आभार ‘उत्पल’ बोधि प्रकाशन
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें