मुझे मंज़ूर है हर फ़ैसला अब
मुहब्बत है गुनह तो हो सज़ा अब
मनाफ़िज़ ये मरासिम की रिदा के
कहेंगे हाले-दिल को बरमला अब
मुख़ातिब है अना से आगही तो
मगर सुनती कहाँ है कुछ अना अब
डुबोया है भँवर में नाख़ुदा ने
करेगा क्या ख़ुदा भी मोजिज़ा अब
किसी के पास जब दिल ही नहीं है
सुनेगा कौन दिल की इल्तिजा अब
सियासतदां दिलों को बाँटते हैं
दिखानी होगी हमको एकता अब
जलाता कौन है दिल को मुसल्सल
बस इक ‘खुरशीद’ है बावला अब
मनाफ़िज़-छेद मरासिम-रिश्ते रिदा-चादर बरमला-सबके सामने \मुँह पर
अना-मैं आगही-समझ नाख़ुदा-कर्णधार मोजिज़ा-चमत्कार
मुसल्सल-लगातार
‘खुरशीद’
खैराड़ी जोधपुर (राजस्थान)०९४१३४०८४२२
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