बुधवार, 9 अप्रैल 2014

प्रतिष्टित पत्रिका 'पुष्पवाटिका' के अप्रेल २०१४ अंक में शाया हुई ग़ज़ल 'मुझे अबला समझना मत......

मुझे अबला समझना मत मैं दुर्गा हूं भवानी हूं         
जिसे पूजा है वेदों ने मैं वो ताकत पुरानी हूं                     

मेरे ही नाम से है नाम तेरा भी ज़माने में
कभी राधा सी जोगन हूं कभी मीरा दीवानी हूं

नहीं मूरख कोई तुझसा मुझे दासी समझता है
तू राजा है मेरे दिल का मैं तेरे दिल की रानी हूं

मेरी जुल्फ़ें ग़मों की धूप में है शामियाने सी
ख़ुशी का मैं ठिकाना हूं सुखों की राजधानी हूं

गुलाबों को चमन की शान कहते हो मगर सुन लो
महकता है मुझी से घर जुही हूं रातरानी हूं
                                                  
मुझे क्यूं कोख में ही मौत की सौगात देते हो        
मेरी ही कोख में दुनिया पली मैं जिंदगानी हूं          
                                             
न बुर्क़े में छुपूंगी अब न घूंघट में लजाऊंगी
ख़ुदा के नूर का जलवा हूं जादू आसमानी हूं           

बहन बनकर बलाएं ले रही हूं मैं तेरी बीरा
मैं ही अम्मा मैं ही बीबी मैं ही बिटिया सयानी हूं

मुझे जूती किसी ने पाँव की कहकर पुकारा है
अरे मर्दों मुझे झुककर करो सज्दा ज़नानी हूं

तेरे बिन मैं अधूरी हूं मेरे बिन तू अधुरा है
तेरी साझी तेरी साथी हर इक युग की कहानी हूं

ये महँदी बिंदिया कुमकुम ये काजल चूड़ियाँ पायल

सुहागन हूं तेरे सौभाग्य की सुन्दर निशानी हूं 

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