बुधवार, 9 अप्रैल 2014

प्रतिष्टित लफ्ज़ पोर्टल की तरही १७ में पोस्ट हुई एक ग़ज़ल 'साथी न था कोई भी कहीं भी ....अप्रेल २०१४

साथी न था कोई भी कहीं भी शजर न था
तनहा था मैं सफ़र भी मिरा मुख़्तसर न था
मुझको सँवारती थी बसीरत हर इक जगह
बेघर तो था मगर मैं कभी बेबसर न था
बातें नसीमे-सुब्ह तबस्सुम शमीमे-गुल
तेरे सिवा चमन में कोई दीदावर न था
अब बैठती नहीं है गुलों पर भी तितलियाँ
छलनी कभी यक़ीन का दिल इस कदर न था
दुनिया में पत्थरों का कभी क़हत था नहीं
गोया इबादतों का मुझी में हुनर न था
ख़ुशबू तिरे जमाल की थी ज़ह्न में भरी
इस तरह दिल पे बू-ए-अना का असर न था
अचरज नहीं जो राख है बस्ती सराब की
होठों पे किस के जलता हुआ इक शरर न था
दीवार थी न बाम दरीचा-ओ-दर न थे
बेघर तो लोग वे भी न थे जिनके घर न था
पागल बनाया क़ामते-दिलदार ने मुझे
मुझमें तो शायरी का ज़रा भी हुनर न था
अश्कों की एक नहर मिरे गाल पर तो थी
दीदा-ए-तर से सहरा-ए-लब तर-ब-तर न था
पुरदाद तेरे जुरअते-इफ़शा-ए-राज़ पर
मुझको भी एतिबार तिरा मोतबर न था
मुझको यक़ीन भी था तिरी बारगाह पर
मुझमें ज़रा सा ज़ब्ते-फ़ुग़ाँ भी मगर न था
था चश्मे-नूर ग़ारे-सियाही के पार ही
उसको ख़बर थी फिर भी वो अहले-सफ़र न था

 ‘खुरशीदजी जलाते कहीं भी चराग़े-दिल
थी रौशनी कहाँ तो अँधेरा किधर न था

सोमवार, 3 मार्च 2014

आ.नवीन भाई सा. के पोर्टल 'ठाले बैठे] में शामिल होली के सरस दोहे

फागुन आया है सखी, नाचे मन का मोर - खुर्शीद खैराड़ी
फागुन आया है सखी, नाचे मन का मोर 
हर बाला है राधिके, बालक नंद किशोर  

फागुन की मस्ती चढ़ी, बाजे ढोलक चंग
धरती के उल्लास का, नभ तक छाया  रंग

गीत सुनाते होरिये, देते ढप पर थाप
सबके मुखड़े है रँगे, कौ बेटा कौ बाप

भीगे तन से कंचुकी, चिपकी ऐसे आज
बूढ़ों तक के नैन की, बूड़ गई है लाज

लाली मेरे गाल की ,और हुई है लाल
बाँह पकड़ कर श्याम ने, मल दी लाल गुलाल

जल जाये मन की घृणा ,बच जाये बस प्यार
आओ खेलें प्यार से ,प्यार भरा त्यौहार

छायी मस्ती गैर की, गली गली में धूम
गाऊंगा मैं रात भर ,संग सखी तू झूम

होली में होलें सगे, भूलें सारा बैर
आओ लग जायें गले, माँगे सबकी खैर

भांग चढ़ा कर जेठ जी, भूल गए मर्याद
सुन कर मैं शरमा गई, प्रेम पगे संवाद

भर पिचकारी रंग की, मारे मो पे धार
देवर मेरा लाड़ला, मुस्कावे भरतार

जीजा साली साथ में, खेल रहे हैं फाग
तन रँगना तुम प्रेम से, मन रखना बेदाग़

होली के माहौल को, करते लोग ख़राब
त्यौहारों की आड़ में, पीते ख़ूब शराब

गैर-होली का एक नृत्य भरतार-पति

'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर राजस्थान

आ.नवीन भाई सा. के पोर्टल 'ठाले बैठे' के होली विशेषांक फरवरी २०१४ में शामिल होली की एक ग़ज़ल '...रँग देना '

खुशियों से उस दिलबर का घर रँग देना - खुर्शीद खैराड़ी
खुशियों से उस दिलबर का घर रँग देना
गम से   मेरे    दीवारोदर   रँग देना

उम्मीदों  के  सूरज !  ढलने से पहले
देहातों  का  धूसर  मंज़र  रँग देना

साये का तन काला ही तुम पाओगे
रंग न लायेगा कुछ पैकर रँग देना

याद बहुत आये हर होली पर ज़ालिम
तेरा मुझको पास बुलाकर रँग देना

शीश झुकाऊं मातृधरा की रज तुझको
आशीषों से तू मेरा सर रँग देना

एक परेवा गीत कफ़स में गाता है
परवाज़ों से फिर मेरे पर रँग देना

ज्ञान युगों से काग़ज़ काले करता है
श्रद्धा चाहे केवल पत्थर रँग देना

रंग चढ़ा है मुझ पर साजन का श्यामल
व्यर्थ रहेगा यारों मुझ पर रँग देना

सुन खुरशीदबुझाना मत अश्कों से

आग अगर दिल में हो आखर रँग देना

'शब्द प्रवाह ' के ग़ज़ल गीतिका विशेषांक दिस.२०१३ में प्रकाशित ग़ज़ल 'हरे पीड़ा दुखी मन की.......


प्रतिष्टित 'लफ्ज़' पोर्टल की तरही १६ में सराही गई एक ग़ज़ल 'तेरी ज़फ़ा का जो दिल पर जमील छाला है' जन.२०१४


सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

सलीबों पर हैं - 'वर्तमान साहित्य' फरवरी २०१४ अंक में शा'या हुई एक और ग़ज़ल

पताका सच की उठाने वाले सलीबों पर हैं
दिये जिनने तीरगी में बाले सलीबों पर हैं

ठगों का है राज, सिंहासन पर लुटेरे हैं अब
बरी दोषी, लोग भोले भाले सलीबों पर हैं

यही है दस्तूर इस बेईमान युग का यारों
उसूलोईमाँ जिन्होंने पाले  सलीबों पर हैं

सहे जाओ आजकल हर ज़ोरोज़बर चुप रहकर
नहीं है जिनकी जुबाँ पर ताले सलीबों पर हैं

मिलाओ ‘खुरशीद’ जी अपनी ताल तुम दुनिया से

जता देता हूं सभी बेताले सलीबों पर हैं
सलीब-शूली क्रास जिस पर ईसा को लटकाया गया था 
'खुरशीद' खैराड़ी 

प्रतिष्टित साहित्यिक पत्रिका 'वर्तमान साहित्य ' के फरवरी २०१४ अंक में प्रकाशित एक ग़ज़ल 'अज़ीज़ो इन दिनों ...'

अज़ीज़ों इन दिनों हालात ये भी सामने आये
अँधेरे  के  नुमाइंदे    उजाले  बाँटने  आये

हमारे बीच में जिनने फ़सीलें कल खड़ी की थी
दिलों की दूरियों को आज वो ही पाटने आये

फ़राहम हो गये दोनों ही गुट फिर से चुनावों में
हमें लुटने की जल्दी है लुटेरे लूटने आये

सरापा दाग़ है जिनके ज़मीरों-रूह पर यारों
सफ़ी बनकर वही मेरी सदाक़त जाँचने आये

न हमको रास आयी मेज़बानी कुछ हबीबों की
न खोला मुस्कुरा कर दर न दर तक छोड़ने आये

मेरी आज़ाद फ़ित्रत चाहती है इन दिनों ऐसा
मेरे पाँवों में भी ज़ंजीर कोई बाँधने आये

वो जिनकी रौशनी से आँखें मेरी चौंधियाती हैं
मेरी बेनूर हस्ती से उजाले माँगने आये

पिरोये हैं मेरी रग रग में जिनने दर्द के मोती
वही देखो मेरी आँखों के आँसू पोंछने आये

उजाले क़ैद हैं गठरी में शब की जानते हैं सब

अँधेरे की गिरह ‘खुरशीद’ कोई खोलने आये

फ़सीलें-दीवारें ,फ़राहम-एकत्र ,सरापा-सर से पाँव तक ,सफ़ी-धवल ,सदाक़त-सच्चाई 
'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२ 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल की तरही १५ में सराही गई एक और ग़ज़ल 'है गर्दे फिक्र जबीं पर .....'दिसम्बर २०१३

T-15/17 है गर्दे-फ़िक्र जबीं पर इसे हटाना क्या-‘खुरशीद’ खैराड़ी-2

है गर्दे-फ़िक्र जबीं पर इसे हटाना क्या ! ! !
दबा हुआ है यहाँ भी कोई खज़ाना क्या ?
टिका दिया है निशाने पे दिल को फिर मैंने
हर इक दफ़ा तो चुकेगा तेरा निशाना क्या
ये आपकी है मुहब्बत निखर गया हूं कुछ
वगरना मुझमें था अहसास शाइराना क्या
नमक भी होता है अश्कों में अब नहीं रोना
हरा न होगा अरे ज़ख्म ये पुराना क्या
वो ख़ुदपरस्त है ख़ुद को ख़ुदा समझता है
सभी के बीच उसे आइना दिखाना क्या
बरहनगी ही जहाँ का रिवाज हो यारों
कटा-फटा हुआ दामन वहाँ छुपाना क्या
ये माना देर से आया है आया तो है वो
ज़रा सी बात पे इस दर्जा मुंह फुलाना क्या
जो रोज़ खाब में आकर उन्हें सजाता है
तो उसकी याद में फिर रतजगा मनना क्या
न सोहनी तू उतरना मिलन की चाहत में
‘वो नर्मरो है नदी का मगर ठिकाना क्या’
अभी तो जलता है ‘खुरशीद’ भी दुपहरी में
ढलेगी शाम तो चाहोगे जगमगाना क्या
‘खुरशीद’ खैराड़ी 09413408422

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल तरही १५ में सराही गई एक ग़ज़ल 'फ़कीर हम हैं बसायेंगे आशियाना क्या 'दिसम्बर २०१३

T-15/2 फ़क़ीर हम हैं बसायेंगे आशियाना क्या-’खुरशीद’ खैराड़ी

फ़क़ीर हम हैं बसायेंगे आशियाना क्या
लुटा के मस्ती को पाइंदगी कमाना क्या
तिरे सवाल का साक़ी जवाब दूं क्या मैं
दरे-हरम से भटक कर शराबख़ाना क्या
ये ज़र्ब भी मैं सहूंगा कि बेवफ़ा है वो
हक़ीक़तों से अज़ीज़ो नज़र चुराना क्या
हर इक नज़र है हिरासाँ हर इक ज़बाँ साकित
ख़ुलूसे-अहले-सियासत को आज़माना क्या
कोई क़ायम यहाँ मुस्तक़िल नहीं प्यारे
सराय ठहरी ये दुनिया तो हक़ जताना क्या
मुझे हरीफ़ों से शिकवा नहीं बस इक ग़म है
न लाज़िमी था हबीबों का साथ आना क्या
जुमूद सोच का तुझ तक रमीदगी तुझ से
इसी हिसार का मरकज़ है ये ज़माना क्या
तिरे लिये तो सजाये हैं थाल भक्तों ने
नहीं सवाब मिरी भूख को मिटाना क्या
सिमट रही है ये दुनिया सभी दिशाओं से
किसी दिशा में भटकते कदम बढ़ाना क्या
न बादबान उतारो ये देखकर माँझी
‘वो नर्मरौ है नदी का मगर ठिकाना क्या’
जदीद फ़िक्र है ‘ख़ुरशीद’ की यही यारो
न रंग लायेगा मेरा जिगर जलाना क्या
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल की तरही १४ में सराही गई एक ग़ज़ल नव.२०१३ 'अपनी ही जुस्तजू में .....'

अपनी ही जुस्तजू में तिरी दोस्ती सही
तब्दीलियों में तेरी मिरी शायरी सही
मैंने ही रेगज़ार में चश्मे किये तलाश
मैंने ही ताहयात मगर तिश्नगी सही
अच्छा हरेक ध्यान है निर्गुण हो या सगुण
साकार के सफ़र पे चलें दिल्लगी सही
सब लोग ख़स्ताहाल हैं सबको मलाल है
महँगाई ने निचोड़ दीं साँसें रही सही
हालात बार बार मुझे तोड़ते रहे
पत्थर था, ख़ाकसार हुआ, ज़िन्दगी सही
लोबान बनके रोज़ मेरे ख़्वाब जलते हैं
खुशबू मिरी ग़ज़ल में इसी से हुई सही
‘खुरशीद’ शेर कहता है कमज़ोर…नाम के ?
‘अच्छा ये आप समझे है अच्छा यही सही ‘
महावीर सिंह ‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

'परिंदे' पत्रिका के जून -जुलाई २०१३ अंक में 'मेरी ग़ुरबत नसीबों का .....'

'परिंदे' पत्रिका के जून -जुलाई २०१३ अंक में 'मेरी ग़ुरबत नसीबों का .....'

मेरी गुरबत नसीबों का तमाशा हो नहीं सकती
कहीं बस गुल, कहीं बस खार कुदरत बो नहीं  सकती

पड़े फीके सभी गहने जवाहर-मोतियों वाले
पसीने के मोती  की जगमगाहट खो नहीं सकती

जहां नींदे कलम की हो उडी शब देखकर यारों
कभी उस मुल्क की किस्मत अदीबों सो नहीं सकती

भरा बस पेट खुद का भूख के इस दौर में हमने
हमारे पाप को गंगा मैया भी धो नहीं सकती

मेरी मुस्कान को खुश दौर का सिम्बल बनाओ मत
हुए हालत बद इतने रियाया रो नहीं सकती

गरीबी को मिटाने का करे दावा सियासत फिर
बिना इसके अमीरों पर इनायत हो नहीं सकती

जलूंगा जब तलक है सांस यूँ 'खुरशीद' ने ठाना
मेरी रू जुल्मतों का बोझ इतना ढो नहीं सकती
       परिंदे जून-जुलाई२०१३ खुरशीद 'खैराड़ी' जोधपुर ०९४१३४०८४२२

आ.नवीन सी .चतुर्वेदी के ब्लॉग ठाले बैठे पर मेरे कुछ हिंदी दोहे विषय 'नवरात्री '

राम घरों में सो रहे ,रावण है मुस्तैद
भोग रही है जानकी, युगों युगों से कैद

जगजननी जगदम्ब की, क्यूं है मक़तल कोख
मूरत को गलहार है, औरत को क्यूं तौक़

दीप जलाकर रोशनी, घर घर होती आज
फिर भी क्यूं अंधकार का, घट घट में राज

सदियों से रावण दहन की है अच्छी रीत
फिर भी होती है बुरे लोगों की ही जीत

रोशन सारा देश है, जगमग जलते दीप
लेकिन अब भी गाँव है, अंधियारे के द्वीप

घर घर में आराधना, जिसकी करते लोग
उस देवी की दुर्दशा, देख हुआ है सोग

भूखे नंगे लोग है, गूंगी हर आवाज़
ग़ुरबत रावण हो गई, कौन करे आगाज़

दुर्गा दुर्गति नाशती, देती है सद्ज्ञान
फिर भी हम बन कर महिष,करते हैं अपमान

अंधियारे को जीतना, तुझको है 'खुरशीद'
जगमग करती भोर ही, तव दीवाली ईद

तौक़-कैदियों के गले में डालने की हँसली

खुरशीद 'खैराड़ी' जोधपुर ०९४१३४०८४२२

आ.नवीन सी .चतुर्वेदी के ब्लॉग ठाले बैठे पर मेरे खैराड़ी दोहे विषय 'नवरात्री '

खांडा ने दे धार माँ, हाथां में दे ज़ोर
दुबलां रे हक़ लार माँ, सगती दूं झकझोर

चामुण्डा धर शीश पर, आशीसां रो हाथ
सामी रूं अन्याव रे, नीत-धरम रे साथ

जगमग जगमग दीवला, मावस में परभात
गाँव-गुवाङी चाँदणौ, कद होसी रुघनाथ

मंस-बली ना माँगती, सब जीवाँ री मात
दारू माँ री भेंट रो, भोपाजी गटकात

तोक लियो कैलास ने, रावण निज भुजपाण
नाभ अनय री भेद दी, एक राम रो बाण

कलजुग में दसमाथ रा,होग्या सौ सौ माथ
राम कठै घुस्या फरै, सीता इब बेनाथ

बरसां जूनी रीत है, बालां पुतलो घास
रावण मन रो बाळ लां, चारुं मेर उजास

जसयो हूं आछो बुरो, थारो हूं मैं मात
पत म्हारी भी राखजे, उजळी करजे रात

बायण थारे देवले, शीस  झुकाऊं आर
सब पर किरपा राखजे, बाडोली दातार

शब्दार्थ-खांडा-तलवार,दुबलां -कमज़ोर, रे-के, लार-साथ, सगती-शक्ति
सामी-सामने/विरुद्ध,रूं-रहूं,मावस-अमावस,गाँव-गुवाङी-गाँव तथा बस्ती
चाँदणौ-उजाला,कद-कब,रुघनाथ-रघुनाथ,मंस-माँस, भोपाजी-पुजारी
 चारुं मेर -चारों तरफ़,बायण-एक लोक देवी ,आर-आकर, बाडोली -क्षेत्र विशेष की लोकदेवी
जे अम्बे
खुरशीद'खैराड़ी' ग्राम-बीकरण तह-मांडलगढ़ भीलवाड़ा(राजस्थान)
हाळ मुकाम-जोधपुर ०९४१३४०८४२२

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

लफ्ज़ अकादमी तरही १३ में सराही गई एक और ग़ज़ल अक्टू २०१३ 'होंठो तक आकर ....'

होठों तक आकर छोटा हो जाता है
सागर भी मुझको क़तरा हो जाता है
इंसानों के कुनबे में, इंसां अपना
इंसांपन खोकर नेता हो जाता है
दिन क्या है, शब का आँचल ढुलका कर वो
नूरानी रुख़ बेपरदा हो जाता है
तेरी दुनिया में, तेरे कुछ बंदों को
छूने से मज़हब मैला हो जाता है
जीवन एक ग़ज़ल है, जिसमें रोज़ाना
तुम हँस दो तो इक मिसरा हो जाता है
इस दुनिया में अक्सर रिश्तों पर भारी
काग़ज़ का हल्का टुकड़ा हो जाता है
जिस दिन तुझको देख न पाऊं सच मानो
मेरा उजला दिन काला हो जाता है
नफ़रत निभ जाती है पीढ़ी दर पीढ़ी
प्यार करो गर तो बलवा हो जाता है
झूंठ कहूं, मुझमें यह ऐब नहीं यारों
गर सच बोलूं तो झगड़ा हो जाता है
काला जादू है क्या उसकी आँखों में
जो देखे उसको, उसका हो जाता है
रखता है ‘खुरशीद’ चराग़े-दिल नभ पर
उजला मौसम चौतरफ़ा हो जाता है
ख़ुरशीद’खैराड़ी’ 09413408422
लफ्ज़ अकादमी तरही १३ अक्टूबर २०१३