सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

प्रतिष्टित साहित्यिक पत्रिका 'वर्तमान साहित्य ' के फरवरी २०१४ अंक में प्रकाशित एक ग़ज़ल 'अज़ीज़ो इन दिनों ...'

अज़ीज़ों इन दिनों हालात ये भी सामने आये
अँधेरे  के  नुमाइंदे    उजाले  बाँटने  आये

हमारे बीच में जिनने फ़सीलें कल खड़ी की थी
दिलों की दूरियों को आज वो ही पाटने आये

फ़राहम हो गये दोनों ही गुट फिर से चुनावों में
हमें लुटने की जल्दी है लुटेरे लूटने आये

सरापा दाग़ है जिनके ज़मीरों-रूह पर यारों
सफ़ी बनकर वही मेरी सदाक़त जाँचने आये

न हमको रास आयी मेज़बानी कुछ हबीबों की
न खोला मुस्कुरा कर दर न दर तक छोड़ने आये

मेरी आज़ाद फ़ित्रत चाहती है इन दिनों ऐसा
मेरे पाँवों में भी ज़ंजीर कोई बाँधने आये

वो जिनकी रौशनी से आँखें मेरी चौंधियाती हैं
मेरी बेनूर हस्ती से उजाले माँगने आये

पिरोये हैं मेरी रग रग में जिनने दर्द के मोती
वही देखो मेरी आँखों के आँसू पोंछने आये

उजाले क़ैद हैं गठरी में शब की जानते हैं सब

अँधेरे की गिरह ‘खुरशीद’ कोई खोलने आये

फ़सीलें-दीवारें ,फ़राहम-एकत्र ,सरापा-सर से पाँव तक ,सफ़ी-धवल ,सदाक़त-सच्चाई 
'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर ०९४१३४०८४२२ 

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