सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

सलीबों पर हैं - 'वर्तमान साहित्य' फरवरी २०१४ अंक में शा'या हुई एक और ग़ज़ल

पताका सच की उठाने वाले सलीबों पर हैं
दिये जिनने तीरगी में बाले सलीबों पर हैं

ठगों का है राज, सिंहासन पर लुटेरे हैं अब
बरी दोषी, लोग भोले भाले सलीबों पर हैं

यही है दस्तूर इस बेईमान युग का यारों
उसूलोईमाँ जिन्होंने पाले  सलीबों पर हैं

सहे जाओ आजकल हर ज़ोरोज़बर चुप रहकर
नहीं है जिनकी जुबाँ पर ताले सलीबों पर हैं

मिलाओ ‘खुरशीद’ जी अपनी ताल तुम दुनिया से

जता देता हूं सभी बेताले सलीबों पर हैं
सलीब-शूली क्रास जिस पर ईसा को लटकाया गया था 
'खुरशीद' खैराड़ी 

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