मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

लफ्ज़ अकादमी तरही १३ में सराही गई एक और ग़ज़ल अक्टू २०१३ 'होंठो तक आकर ....'

होठों तक आकर छोटा हो जाता है
सागर भी मुझको क़तरा हो जाता है
इंसानों के कुनबे में, इंसां अपना
इंसांपन खोकर नेता हो जाता है
दिन क्या है, शब का आँचल ढुलका कर वो
नूरानी रुख़ बेपरदा हो जाता है
तेरी दुनिया में, तेरे कुछ बंदों को
छूने से मज़हब मैला हो जाता है
जीवन एक ग़ज़ल है, जिसमें रोज़ाना
तुम हँस दो तो इक मिसरा हो जाता है
इस दुनिया में अक्सर रिश्तों पर भारी
काग़ज़ का हल्का टुकड़ा हो जाता है
जिस दिन तुझको देख न पाऊं सच मानो
मेरा उजला दिन काला हो जाता है
नफ़रत निभ जाती है पीढ़ी दर पीढ़ी
प्यार करो गर तो बलवा हो जाता है
झूंठ कहूं, मुझमें यह ऐब नहीं यारों
गर सच बोलूं तो झगड़ा हो जाता है
काला जादू है क्या उसकी आँखों में
जो देखे उसको, उसका हो जाता है
रखता है ‘खुरशीद’ चराग़े-दिल नभ पर
उजला मौसम चौतरफ़ा हो जाता है
ख़ुरशीद’खैराड़ी’ 09413408422
लफ्ज़ अकादमी तरही १३ अक्टूबर २०१३ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें