मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल की तरही १२ में सराही गई एक ग़ज़ल सित.२०१३ 'न था दूसरा कोई ...'

न था दूसरा कोई संसार में
हुआ मैं ही फ़िट अपने किरदार में
पसे-दर मकां में सभी अंधे हैं
दरीचे हज़ारों हैं दीवार में
बहारें अजब दिल्लगी कर गयीं
उगे ख़ार ही ख़ार गुलज़ार में
फ़क़ीरी की दौलत मिली उस क़दर
लुटा जिस क़दर मैं तिरे प्यार में
ग़मों को ग़ज़ल में लिया ढाल जब
तो आने लगा लुत्फ़ आज़ार में
इधर मैं उधर मैं हर इक सिम्त हूं
दबा हूं ख़ुद अपने ही अम्बार में
न कोई शनासा न कोई सगा
अकेला हूं दुनिया के बाज़ार में
फ़क़त तू फ़क़त तू फ़क़त तू ही तू
नहीं दूसरा कोई पिन्दार में
चरागाँ तेरी याद ने कर दिया
तसव्वुर के इक स्याहरू ग़ार में
ख़ुरशीद खैराड़ी, जोधपुर 09413408422
तरही १२ लफ्ज़ अकादमी २०१३

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