गुरुवार, 14 अगस्त 2014

समाज कल्याण विभाग की पत्रिका 'समाज कल्याण ' में शाया हुई एक ग़ज़ल 'आँखों में इक ख़्वाब सुहाना...' मई २०१४

आँखों में इक ख़्वाब सुहाना बरसों से है
पुरखों का इक गाँव पुराना बरसों से है

जिसने देखा है मेरे परदादा तक को
आँगन में इक नीम सुहाना बरसों से है

इमरत जैसा मीठा पानी एक कुएँ का
मोती का इक खेत खज़ाना बरसों से है

इक पगडण्डी साखी है इक पूरे युग की
हम लोगों का आना जाना बरसों से है

ठाकुर जी की आले में इक दीप सनातन
साँझ ढले जिसका जग जाना बरसों से है

दादी माँ के बुगसे में इक झबला टोपी
मेरे बेटे का नज़राना बरसों से है

पीढ़ी दर पीढ़ी यादों का एक कनागत
खपरैलों पर इक कौवा काना बरसों से है

काका-मामा फूफा मौसी देवर ननदी
रिश्तों का यह ताना बाना बरसों से है

जिसके होठों पर है जंग लगी इक चुप्पी
जर्जर घर में इक तहखाना बरसों से है

तुलसी-चौरा पीपल-पूजा जल-चरणामृत
कह लो तुम चाहे बचकाना  बरसों से है

ठाकुर द्वारे की चौकी पर खोल जटाएं
तपधारी इक बरगद दाना बरसों से है

पनघट पर जमघट घूँघट ओढ़े चाँदों का
खुसरो का इक लोक तराना बरसों से है

शाहिद इस अंबर पर है खुरशीद अज़ल से

कायम अब तक एक घराना बरसों से है 

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