सोमवार, 12 मार्च 2018

एक डेढ़ रुक्नी ग़ज़ल

एक डेढ़ (1-1/2) रुक्नी ग़ज़ल
1 2 2 2--1 2 2
तेरी हसरत है अब भी
मुझे उल्फ़त है अब भी

निकालो वक़्त थोड़ा
मुझे फ़ुर्सत है अब भी

तेरा ग़म बेमुरव्वत !
मेरी दौलत है अब भी

सितारे तोड़ लाऊँ
जवाँ जुर्अत है अब भी

छिड़कना जान तुझ पर
मेरी आदत है अब भी

कि दिल के आइने में
तेरी सूरत है अब भी

तेरे बीमार की तो
वही हालत है अब भी

वफ़ादारों में थोड़ी
मेरी इज़्ज़त है अब भी

उछालो बोलियाँ तुम
मेरी क़ीमत है अब भी

मिरे तकिये के नीचे
किसी का ख़त है अब भी

ग़ज़ल 'खुरशीद' की चख
लगे शरबत है अब भी
© खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




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