जोगी बनकर बैठा हूँ
तेरे दर पर बैठा हूँ
खोल किवाड़ी तू दिल की
कब से बेघर बैठा हूँ
कब पिघलेगा दिल तेरा
बनकर पत्थर बैठा हूँ
ग़म हूँ शायर के दिल का
आखर-आखर बैठा हूँ
पीठ दिखाऊँ किस किस को
खाकर खंज़र बैठा हूँ
आँखों में है क़ैद फ़लक
शाख प' बेपर बैठा हूँ
उसको कुछ परवाह नहीं
जिस पर निर्भर बैठा हूँ
ढूँढ़ रहे हैं लोग मुझे
जब कि उजागर बैठा हूँ
अब जीने की चाह नहीं
इक तुझ पर मर बैठा हूँ
तेरे पथ में इक युग से
देख बराबर बैठा हूँ
तू आवाज़ तो दे मुझको
तेरे भीतर बैठा हूँ
बज़्म सजी है इक मुझमें
मैं ही बाहर बैठा हूँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर। 9413408422
तेरे दर पर बैठा हूँ
खोल किवाड़ी तू दिल की
कब से बेघर बैठा हूँ
कब पिघलेगा दिल तेरा
बनकर पत्थर बैठा हूँ
ग़म हूँ शायर के दिल का
आखर-आखर बैठा हूँ
पीठ दिखाऊँ किस किस को
खाकर खंज़र बैठा हूँ
आँखों में है क़ैद फ़लक
शाख प' बेपर बैठा हूँ
उसको कुछ परवाह नहीं
जिस पर निर्भर बैठा हूँ
ढूँढ़ रहे हैं लोग मुझे
जब कि उजागर बैठा हूँ
अब जीने की चाह नहीं
इक तुझ पर मर बैठा हूँ
तेरे पथ में इक युग से
देख बराबर बैठा हूँ
तू आवाज़ तो दे मुझको
तेरे भीतर बैठा हूँ
बज़्म सजी है इक मुझमें
मैं ही बाहर बैठा हूँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर। 9413408422
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