सोमवार, 12 मार्च 2018

एक रुक्नी ग़ज़ल

एक रुक्नी ग़ज़ल कहने की कोशिश की है।
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तिरा ग़म है
तभी दम है

ग़ज़ल बो दो
ज़मीं नम है

चले आओ
कि मौसम है

दुखाकर दिल
वो बरहम*है  (*disturb)

न मैं कम हूँ
न वो कम है

नमक लाया
कि मर्हम है

ख़ुदी* है गुम (*consciousness)
य' आलम है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।





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