एक रुक्नी ग़ज़ल कहने की कोशिश की है।
1 2 2 2
तिरा ग़म है
तभी दम है
ग़ज़ल बो दो
ज़मीं नम है
चले आओ
कि मौसम है
दुखाकर दिल
वो बरहम*है (*disturb)
न मैं कम हूँ
न वो कम है
नमक लाया
कि मर्हम है
ख़ुदी* है गुम (*consciousness)
य' आलम है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
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तिरा ग़म है
तभी दम है
ग़ज़ल बो दो
ज़मीं नम है
चले आओ
कि मौसम है
दुखाकर दिल
वो बरहम*है (*disturb)
न मैं कम हूँ
न वो कम है
नमक लाया
कि मर्हम है
ख़ुदी* है गुम (*consciousness)
य' आलम है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।
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