रविवार, 11 मार्च 2018

इक ग़ज़ल -;हिज़्र

बड़ा साफ़ सा इश्क़ का फलसफ़ा है
मैं बंदा हूँ उसका वो मेरा ख़ुदा है

कहीं धुल न जाए मिरे आँसुओं से
हथेली प' उसके किसी की हिना है

खता हो गई पी लिया इश्क़ तेरा
बता बचने का अब कोई रास् ता है

जुदाई में हालत मेरी हो गई क्या
ख़ुदा की कसम बस ख़ुदा जानता है

तमन्ना है मैं फूटकर आज रोऊँ
कोई मुझसे पूछे मेरा हाल क्या है

मैं उस पर फ़िदा हूँ फ़िदा हूँ फ़िदा हूँ
वो मुझसे ख़फ़ा है ख़फ़ा है ख़फ़ा है

सिसकती है तू भी सिसकता हूँ मैं भी
तुझे क्या हुआ है मुझे क्या हुआ है

मुहब्बत नहीं तो य' क्या है बता दे
कोई रात दिन बस तुझे सोचता है

वफ़ा मेरी आदत, जफ़ा तेरी फ़ितरत
य' मेरी अदा है, य' तेरी अदा है

तो मुझको हबीबों दुआ मौत की दो
जो बीमार दिल की न कोई दवा है

सुलगता है 'खुरशीद' फ़ुर्क़त मैं किसकी
अज़ल से मुनव्वर यही मुद् दआ है
"खुरशीद" खैराड़ी जोधपुर 11.3.18
9413408422


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