बुधवार, 21 मार्च 2018

एक कविता

विश्व-कविता दिवस पर एक कविता
(कृपया मूल रूप में सनाम ही शेयर करें)

अलसुब्ह अँगड़ाई लेते हुए
उठती है अलसाई सी कविता
चाय के साथ उबलता है
एक कड़क ख़याल
टिफ़िन में अलुमिनियम फॉयल में
पैक हो जाता है एक गर्म अहसास
यूनिफॉर्म और स्कूल बैग के साथ
सँवर कर मुस्कुराते हैं कुछ ख़ाब
बच्चों को टैक्सी में बिठाने की हड़बड़ी में
इधर-उधर बिखर जाते हैं कुछ मिसरे
जिन्हें समेटा जाता है
तसल्ली से अख़बार पढ़ते हुए
गमलों को पानी पिलाते हुए
सरस होते हैं कुछ भाव
जो बरस जाते हैं तुम्हें आलिंगन में भरकर

काम पर इंजन की भड़-भड़ के साथ
कुछ काफ़िए रदीफ़ मिलाते हैं
स्टॉफ की चिक-चिक-बड़-बड़ से
डीज़ल के धुँए के साथ
उठते हैं कुछ ग्रीस-सने अशआर
लंच में घर आते समय
बाइक की रफ़्तार के साथ
रवाँ होती है एक ग़ज़ल
एक ग़ज़ल जो दिन भर गुनगुनाती है
मेरे ग़म को मीठे स्वर में

कविता शाम को बच्चों की शरारत
से पाती है अलंकार
और तुम्हारी शिकायतों से
समेटती है नित नई उपमाएँ
कविता बाँहों में बाँहें डालकर
मेरे साथ घूमती है
सरदारपुरा के सजे-धजे बाज़ार में
कविता ठुमक कर उठाती है
नेशनल हैंडलूम में केरी-बेग
और बड़बड़ाती रहती है
कितनी लक्षणाएँ और व्यंजनाएँ
रात को कविता
तर्तीब से जमाती है कुछ छंद
समेट कर रखती है कुछ बहरें
व्हाट्स अप पर पोस्ट होकर
सो जाती है मेरे पहलू में
मेरे बालों से दिन-भर की थकान झाड़ते हुए

कविता वो नहीं जो मैं लिखता हूँ
कविता असल में वो है जो तुम जीती हो
ओ ! मेरे जीवन की असली कविता
तुम मेरा सृजन नहीं
मेरी दिनचर्या हो।
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422

बुधवार, 14 मार्च 2018

दो रुक्नी ग़ज़ल

सबसे छोटा रुक्न 'फेलुन' इस पर दो रुक्नी ग़ज़ल कहने का सबसे छोटा प्रयास।
चौपाई का अर्धांश "अखंड" छंद।
फेलुन-फेलुन
22--22
प्यार अगर दो
जीवन भर दो

ख़ाब उगा दूँ
दिल बंज़र दो

बोझ ग़मों का
मुझ पर धर दो

तन दरिया है
मन सागर दो

मुझको छूकर
पावन कर दो

पंख दिए हैं
तो अंबर दो

तुमको वर लूँ
ऐसा वर दो

नैन हैं रीते
दर्शन भर दो

जान लुटा दूँ
इक अवसर दो

लोग झुकेंगे
तुम आदर दो

मैं फल दूँगा
तुम पत्थर दो
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

ग़ज़ल ज़िंदगी आना

मुझसे मिलने भी तू कभी आना
मौत से पहले ज़िन्दगी आना

जान लेकर ही अब तो छोड़ेगा
रात-दिन याद आपकी आना

होश में आप गर कभी आओ
देखने मेरी बेख़ुदी आना

देखिए आपके तसव्वुर से
मेरी ग़ज़लों में ताज़गी आना

दिल को चीरा तो शेर निकले हैं
कोई आसां है शायरी आना

दोस्ती आपको न रास आई
अब निभाने तो दुश्मनी आना

बात 'खुरशीद' ग़ैर मुमकिन है
गुल चराग़ों से रौशनी आना
© खुरशीद खैराड़ी जोधपुर 9413408422

सोमवार, 12 मार्च 2018

एक रुक्नी ग़ज़ल

एक रुक्नी ग़ज़ल कहने की कोशिश की है।
1 2 2 2
तिरा ग़म है
तभी दम है

ग़ज़ल बो दो
ज़मीं नम है

चले आओ
कि मौसम है

दुखाकर दिल
वो बरहम*है  (*disturb)

न मैं कम हूँ
न वो कम है

नमक लाया
कि मर्हम है

ख़ुदी* है गुम (*consciousness)
य' आलम है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।





एक डेढ़ रुक्नी ग़ज़ल

एक डेढ़ (1-1/2) रुक्नी ग़ज़ल
1 2 2 2--1 2 2
तेरी हसरत है अब भी
मुझे उल्फ़त है अब भी

निकालो वक़्त थोड़ा
मुझे फ़ुर्सत है अब भी

तेरा ग़म बेमुरव्वत !
मेरी दौलत है अब भी

सितारे तोड़ लाऊँ
जवाँ जुर्अत है अब भी

छिड़कना जान तुझ पर
मेरी आदत है अब भी

कि दिल के आइने में
तेरी सूरत है अब भी

तेरे बीमार की तो
वही हालत है अब भी

वफ़ादारों में थोड़ी
मेरी इज़्ज़त है अब भी

उछालो बोलियाँ तुम
मेरी क़ीमत है अब भी

मिरे तकिये के नीचे
किसी का ख़त है अब भी

ग़ज़ल 'खुरशीद' की चख
लगे शरबत है अब भी
© खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




एक छोटी सी ग़ज़ल

जोगी बनकर बैठा हूँ
तेरे  दर  पर  बैठा  हूँ

खोल किवाड़ी तू दिल की
कब से  बेघर  बैठा हूँ

कब पिघलेगा दिल तेरा
बनकर पत्थर बैठा हूँ

ग़म हूँ शायर के दिल का
आखर-आखर बैठा हूँ

पीठ दिखाऊँ किस किस को
खाकर खंज़र बैठा हूँ

आँखों में है क़ैद फ़लक
शाख प' बेपर बैठा हूँ

उसको कुछ परवाह नहीं
जिस पर निर्भर बैठा हूँ

ढूँढ़ रहे हैं लोग मुझे
जब कि उजागर बैठा हूँ

अब जीने की चाह नहीं
इक तुझ पर मर बैठा हूँ

तेरे पथ में इक युग से
देख बराबर बैठा हूँ

तू आवाज़ तो दे मुझको
तेरे भीतर बैठा हूँ

बज़्म सजी है इक मुझमें
मैं ही बाहर बैठा हूँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर। 9413408422

रविवार, 11 मार्च 2018

इक ग़ज़ल -;हिज़्र

बड़ा साफ़ सा इश्क़ का फलसफ़ा है
मैं बंदा हूँ उसका वो मेरा ख़ुदा है

कहीं धुल न जाए मिरे आँसुओं से
हथेली प' उसके किसी की हिना है

खता हो गई पी लिया इश्क़ तेरा
बता बचने का अब कोई रास् ता है

जुदाई में हालत मेरी हो गई क्या
ख़ुदा की कसम बस ख़ुदा जानता है

तमन्ना है मैं फूटकर आज रोऊँ
कोई मुझसे पूछे मेरा हाल क्या है

मैं उस पर फ़िदा हूँ फ़िदा हूँ फ़िदा हूँ
वो मुझसे ख़फ़ा है ख़फ़ा है ख़फ़ा है

सिसकती है तू भी सिसकता हूँ मैं भी
तुझे क्या हुआ है मुझे क्या हुआ है

मुहब्बत नहीं तो य' क्या है बता दे
कोई रात दिन बस तुझे सोचता है

वफ़ा मेरी आदत, जफ़ा तेरी फ़ितरत
य' मेरी अदा है, य' तेरी अदा है

तो मुझको हबीबों दुआ मौत की दो
जो बीमार दिल की न कोई दवा है

सुलगता है 'खुरशीद' फ़ुर्क़त मैं किसकी
अज़ल से मुनव्वर यही मुद् दआ है
"खुरशीद" खैराड़ी जोधपुर 11.3.18
9413408422


शुक्रवार, 2 मार्च 2018

होली

कौन तजे अभिमान को, कौन करे शुरुआत ।
त्योहारों में आजकल, कहाँ प्रेम की बात ? ।।

रंग उड़ा अब नेह का, फीका मेल मिलाप ।
एक सभी की भावना, पहले आओ आप ।।

होली बाल घमण्ड की, और बचा प्रहलाद ।
लो मैं पहले आ गया, लेकर प्रेम प्रसाद ।।

बाँह पसारी हर्ष से, मन में रख अनुराग ।
लो मैं आया खेलने, द्वार तुम्हारे फाग ।।

खुशियों के हो रंग सब, मस्ती-मौज गुलाल ।
आशा गुंझियों से भरा, हो जीवन का थाल ।।

ठण्डाई हो नेह की, बाजे चंग उमंग ।
नाचे हँस-हँस सम्पदा, बिखरे सुख के रंग ।

छोटे हो या हो बड़े, दुश्मन या हो यार ।
सबको हो शुभ साथियों, रंगों का त्यौहार ।।

मिलने को हम हैं विकल, थिरक रहे हैं पैर ।
होली पर मिल लो गले, थूको मन का बैर ।।
©महावीर सिंह जोधपुर
आप सभी को प्रतिभा-महावीर , रिमझिम-रुनझुन की तरफ़ से होली की बहुत बहुत रंग भरी शुभकामनाएँ। धुलंडी का ढ़ेर सारा रंग और गुलाल। साल भर की हुई गल्तियों की क्षमा याचना। हमेशा प्रेम बनाएँ रखें।
निवेदक
समस्त शक्तावत परिवार जोधपुर।