विश्व-कविता दिवस पर एक कविता
(कृपया मूल रूप में सनाम ही शेयर करें)
अलसुब्ह अँगड़ाई लेते हुए
उठती है अलसाई सी कविता
चाय के साथ उबलता है
एक कड़क ख़याल
टिफ़िन में अलुमिनियम फॉयल में
पैक हो जाता है एक गर्म अहसास
यूनिफॉर्म और स्कूल बैग के साथ
सँवर कर मुस्कुराते हैं कुछ ख़ाब
बच्चों को टैक्सी में बिठाने की हड़बड़ी में
इधर-उधर बिखर जाते हैं कुछ मिसरे
जिन्हें समेटा जाता है
तसल्ली से अख़बार पढ़ते हुए
गमलों को पानी पिलाते हुए
सरस होते हैं कुछ भाव
जो बरस जाते हैं तुम्हें आलिंगन में भरकर
काम पर इंजन की भड़-भड़ के साथ
कुछ काफ़िए रदीफ़ मिलाते हैं
स्टॉफ की चिक-चिक-बड़-बड़ से
डीज़ल के धुँए के साथ
उठते हैं कुछ ग्रीस-सने अशआर
लंच में घर आते समय
बाइक की रफ़्तार के साथ
रवाँ होती है एक ग़ज़ल
एक ग़ज़ल जो दिन भर गुनगुनाती है
मेरे ग़म को मीठे स्वर में
कविता शाम को बच्चों की शरारत
से पाती है अलंकार
और तुम्हारी शिकायतों से
समेटती है नित नई उपमाएँ
कविता बाँहों में बाँहें डालकर
मेरे साथ घूमती है
सरदारपुरा के सजे-धजे बाज़ार में
कविता ठुमक कर उठाती है
नेशनल हैंडलूम में केरी-बेग
और बड़बड़ाती रहती है
कितनी लक्षणाएँ और व्यंजनाएँ
रात को कविता
तर्तीब से जमाती है कुछ छंद
समेट कर रखती है कुछ बहरें
व्हाट्स अप पर पोस्ट होकर
सो जाती है मेरे पहलू में
मेरे बालों से दिन-भर की थकान झाड़ते हुए
कविता वो नहीं जो मैं लिखता हूँ
कविता असल में वो है जो तुम जीती हो
ओ ! मेरे जीवन की असली कविता
तुम मेरा सृजन नहीं
मेरी दिनचर्या हो।
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422
(कृपया मूल रूप में सनाम ही शेयर करें)
अलसुब्ह अँगड़ाई लेते हुए
उठती है अलसाई सी कविता
चाय के साथ उबलता है
एक कड़क ख़याल
टिफ़िन में अलुमिनियम फॉयल में
पैक हो जाता है एक गर्म अहसास
यूनिफॉर्म और स्कूल बैग के साथ
सँवर कर मुस्कुराते हैं कुछ ख़ाब
बच्चों को टैक्सी में बिठाने की हड़बड़ी में
इधर-उधर बिखर जाते हैं कुछ मिसरे
जिन्हें समेटा जाता है
तसल्ली से अख़बार पढ़ते हुए
गमलों को पानी पिलाते हुए
सरस होते हैं कुछ भाव
जो बरस जाते हैं तुम्हें आलिंगन में भरकर
काम पर इंजन की भड़-भड़ के साथ
कुछ काफ़िए रदीफ़ मिलाते हैं
स्टॉफ की चिक-चिक-बड़-बड़ से
डीज़ल के धुँए के साथ
उठते हैं कुछ ग्रीस-सने अशआर
लंच में घर आते समय
बाइक की रफ़्तार के साथ
रवाँ होती है एक ग़ज़ल
एक ग़ज़ल जो दिन भर गुनगुनाती है
मेरे ग़म को मीठे स्वर में
कविता शाम को बच्चों की शरारत
से पाती है अलंकार
और तुम्हारी शिकायतों से
समेटती है नित नई उपमाएँ
कविता बाँहों में बाँहें डालकर
मेरे साथ घूमती है
सरदारपुरा के सजे-धजे बाज़ार में
कविता ठुमक कर उठाती है
नेशनल हैंडलूम में केरी-बेग
और बड़बड़ाती रहती है
कितनी लक्षणाएँ और व्यंजनाएँ
रात को कविता
तर्तीब से जमाती है कुछ छंद
समेट कर रखती है कुछ बहरें
व्हाट्स अप पर पोस्ट होकर
सो जाती है मेरे पहलू में
मेरे बालों से दिन-भर की थकान झाड़ते हुए
कविता वो नहीं जो मैं लिखता हूँ
कविता असल में वो है जो तुम जीती हो
ओ ! मेरे जीवन की असली कविता
तुम मेरा सृजन नहीं
मेरी दिनचर्या हो।
©महावीर सिंह जोधपुर 9413408422