मंगलवार, 13 जून 2017

सूख जाता है

ग़ज़ल 'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर 9413408422

विषैला कीट लग जाए तो पौधा सूख जाता है
कलह घर में जगह करले तो कुनबा सूख जाता है

उधारी और किश्तों में चली जाती है हरियाली
महीने के शुरू होते ही बटुवा सूख जाता है

कभी आओ मिरे घर पर कभी मुझको बुलाओ तुम
कहत हो गर तअल्लुक़ का तो रिश्ता सूख जाता है

हरा मुस्लिम दिखे उसको तो केसरिया दिखे हिन्दू
सियासत की हवाओं से नज़रिया सूख जाता है

जो ऊँचाई प' रहते हैं किसी का साथ क्या देगें
निभाकर बादलों से रब्त दरिया सूख जाता है

मुसल्सल आँसुओं से गर न सींचूँ में ग़ज़ल अपनी
मिरे अशआर का हर एक मिसरा सूख जाता है

हमारे गाँव की 'खुरशीद' आकर देख लो सुब्हें
सियाही देखकर इतनी कलेजा सूख जाता है
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।

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