लोग पागल होरिये हैं
ख़ुद ही घायल होरिये हैं
ख़ून सस्ता और मँहगे
दाल-चावल होरिये हैं
आजकल घर है अखाड़ा
रोज़ दंगल होरिये हैं
जल गई कल फ़स्ल सारी
आज बादल होरिये हैं
भेड़ियों की फ़ौज देखो
शह्र जंगल होरिये हैं
नाग लिपटे हैं ग़मों के
गीत संदल होरिये हैं
देखलो कीचड़ गरज़ का
रिश्ते दलदल होरिये हैं
जल रहा है मुल्क़ सारा
गाँव नक्सल होरिये हैं
जागते 'खुरशीद' रहना
हर तरफ़ छल होरिये हैं
© खुरशीद खैराड़ी जोधपुर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें