मंगलवार, 13 जून 2017

ग़ज़ल जोगिया

ग़ज़ल 'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर 9413408422

बिक गई है रौशनी रे जोगिया
अब अँधेरी हर गली रे जोगिया

जात-मज़हब , दीन-दुनिया से परे
सबसे ऊँची आशिक़ी रे जोगिया

बैर बाँधे हम किसी से किसलिए
चार दिन की ज़िन्दगी रे जोगिया

हिज़्र की रातें कटेगीं किस तरह
चुभ रही है चाँदनी रे जोगिया

दीप मंदिर में है मस्ज़िद में चराग़
नूर सबमें एक ही रे जोगिया

शह्र के इन भेड़ियों की भीड़ में
खो गया है आदमी रे जोगिया

इक मरुस्थल में चमकती झील सी
ग़म के दरिया में ख़ुशी रे जोगिया

रब्त किससे क्या निकालें आज हम
सारे चेहरे अज़नबी रे जोगिया

हाल दुनिया का न देखा जाएगा
ओढ़ ले तू बेख़ुदी  रे जोगिया

क्या भरोसा अब किसी का हम करें
धूप भी है साँवली रे जोगिया

हँसती है 'खुरशीद' तुझ पर बारहा
बस्तियों की तीरगी रे जोगिया
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर।




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