शनिवार, 21 दिसंबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल की तरही १५ में सराही गई एक और ग़ज़ल 'है गर्दे फिक्र जबीं पर .....'दिसम्बर २०१३

T-15/17 है गर्दे-फ़िक्र जबीं पर इसे हटाना क्या-‘खुरशीद’ खैराड़ी-2

है गर्दे-फ़िक्र जबीं पर इसे हटाना क्या ! ! !
दबा हुआ है यहाँ भी कोई खज़ाना क्या ?
टिका दिया है निशाने पे दिल को फिर मैंने
हर इक दफ़ा तो चुकेगा तेरा निशाना क्या
ये आपकी है मुहब्बत निखर गया हूं कुछ
वगरना मुझमें था अहसास शाइराना क्या
नमक भी होता है अश्कों में अब नहीं रोना
हरा न होगा अरे ज़ख्म ये पुराना क्या
वो ख़ुदपरस्त है ख़ुद को ख़ुदा समझता है
सभी के बीच उसे आइना दिखाना क्या
बरहनगी ही जहाँ का रिवाज हो यारों
कटा-फटा हुआ दामन वहाँ छुपाना क्या
ये माना देर से आया है आया तो है वो
ज़रा सी बात पे इस दर्जा मुंह फुलाना क्या
जो रोज़ खाब में आकर उन्हें सजाता है
तो उसकी याद में फिर रतजगा मनना क्या
न सोहनी तू उतरना मिलन की चाहत में
‘वो नर्मरो है नदी का मगर ठिकाना क्या’
अभी तो जलता है ‘खुरशीद’ भी दुपहरी में
ढलेगी शाम तो चाहोगे जगमगाना क्या
‘खुरशीद’ खैराड़ी 09413408422

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल तरही १५ में सराही गई एक ग़ज़ल 'फ़कीर हम हैं बसायेंगे आशियाना क्या 'दिसम्बर २०१३

T-15/2 फ़क़ीर हम हैं बसायेंगे आशियाना क्या-’खुरशीद’ खैराड़ी

फ़क़ीर हम हैं बसायेंगे आशियाना क्या
लुटा के मस्ती को पाइंदगी कमाना क्या
तिरे सवाल का साक़ी जवाब दूं क्या मैं
दरे-हरम से भटक कर शराबख़ाना क्या
ये ज़र्ब भी मैं सहूंगा कि बेवफ़ा है वो
हक़ीक़तों से अज़ीज़ो नज़र चुराना क्या
हर इक नज़र है हिरासाँ हर इक ज़बाँ साकित
ख़ुलूसे-अहले-सियासत को आज़माना क्या
कोई क़ायम यहाँ मुस्तक़िल नहीं प्यारे
सराय ठहरी ये दुनिया तो हक़ जताना क्या
मुझे हरीफ़ों से शिकवा नहीं बस इक ग़म है
न लाज़िमी था हबीबों का साथ आना क्या
जुमूद सोच का तुझ तक रमीदगी तुझ से
इसी हिसार का मरकज़ है ये ज़माना क्या
तिरे लिये तो सजाये हैं थाल भक्तों ने
नहीं सवाब मिरी भूख को मिटाना क्या
सिमट रही है ये दुनिया सभी दिशाओं से
किसी दिशा में भटकते कदम बढ़ाना क्या
न बादबान उतारो ये देखकर माँझी
‘वो नर्मरौ है नदी का मगर ठिकाना क्या’
जदीद फ़िक्र है ‘ख़ुरशीद’ की यही यारो
न रंग लायेगा मेरा जिगर जलाना क्या
‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

लफ्ज़ पोर्टल की तरही १४ में सराही गई एक ग़ज़ल नव.२०१३ 'अपनी ही जुस्तजू में .....'

अपनी ही जुस्तजू में तिरी दोस्ती सही
तब्दीलियों में तेरी मिरी शायरी सही
मैंने ही रेगज़ार में चश्मे किये तलाश
मैंने ही ताहयात मगर तिश्नगी सही
अच्छा हरेक ध्यान है निर्गुण हो या सगुण
साकार के सफ़र पे चलें दिल्लगी सही
सब लोग ख़स्ताहाल हैं सबको मलाल है
महँगाई ने निचोड़ दीं साँसें रही सही
हालात बार बार मुझे तोड़ते रहे
पत्थर था, ख़ाकसार हुआ, ज़िन्दगी सही
लोबान बनके रोज़ मेरे ख़्वाब जलते हैं
खुशबू मिरी ग़ज़ल में इसी से हुई सही
‘खुरशीद’ शेर कहता है कमज़ोर…नाम के ?
‘अच्छा ये आप समझे है अच्छा यही सही ‘
महावीर सिंह ‘खुरशीद’ खैराड़ी जोधपुर 09413408422

'परिंदे' पत्रिका के जून -जुलाई २०१३ अंक में 'मेरी ग़ुरबत नसीबों का .....'

'परिंदे' पत्रिका के जून -जुलाई २०१३ अंक में 'मेरी ग़ुरबत नसीबों का .....'

मेरी गुरबत नसीबों का तमाशा हो नहीं सकती
कहीं बस गुल, कहीं बस खार कुदरत बो नहीं  सकती

पड़े फीके सभी गहने जवाहर-मोतियों वाले
पसीने के मोती  की जगमगाहट खो नहीं सकती

जहां नींदे कलम की हो उडी शब देखकर यारों
कभी उस मुल्क की किस्मत अदीबों सो नहीं सकती

भरा बस पेट खुद का भूख के इस दौर में हमने
हमारे पाप को गंगा मैया भी धो नहीं सकती

मेरी मुस्कान को खुश दौर का सिम्बल बनाओ मत
हुए हालत बद इतने रियाया रो नहीं सकती

गरीबी को मिटाने का करे दावा सियासत फिर
बिना इसके अमीरों पर इनायत हो नहीं सकती

जलूंगा जब तलक है सांस यूँ 'खुरशीद' ने ठाना
मेरी रू जुल्मतों का बोझ इतना ढो नहीं सकती
       परिंदे जून-जुलाई२०१३ खुरशीद 'खैराड़ी' जोधपुर ०९४१३४०८४२२

आ.नवीन सी .चतुर्वेदी के ब्लॉग ठाले बैठे पर मेरे कुछ हिंदी दोहे विषय 'नवरात्री '

राम घरों में सो रहे ,रावण है मुस्तैद
भोग रही है जानकी, युगों युगों से कैद

जगजननी जगदम्ब की, क्यूं है मक़तल कोख
मूरत को गलहार है, औरत को क्यूं तौक़

दीप जलाकर रोशनी, घर घर होती आज
फिर भी क्यूं अंधकार का, घट घट में राज

सदियों से रावण दहन की है अच्छी रीत
फिर भी होती है बुरे लोगों की ही जीत

रोशन सारा देश है, जगमग जलते दीप
लेकिन अब भी गाँव है, अंधियारे के द्वीप

घर घर में आराधना, जिसकी करते लोग
उस देवी की दुर्दशा, देख हुआ है सोग

भूखे नंगे लोग है, गूंगी हर आवाज़
ग़ुरबत रावण हो गई, कौन करे आगाज़

दुर्गा दुर्गति नाशती, देती है सद्ज्ञान
फिर भी हम बन कर महिष,करते हैं अपमान

अंधियारे को जीतना, तुझको है 'खुरशीद'
जगमग करती भोर ही, तव दीवाली ईद

तौक़-कैदियों के गले में डालने की हँसली

खुरशीद 'खैराड़ी' जोधपुर ०९४१३४०८४२२

आ.नवीन सी .चतुर्वेदी के ब्लॉग ठाले बैठे पर मेरे खैराड़ी दोहे विषय 'नवरात्री '

खांडा ने दे धार माँ, हाथां में दे ज़ोर
दुबलां रे हक़ लार माँ, सगती दूं झकझोर

चामुण्डा धर शीश पर, आशीसां रो हाथ
सामी रूं अन्याव रे, नीत-धरम रे साथ

जगमग जगमग दीवला, मावस में परभात
गाँव-गुवाङी चाँदणौ, कद होसी रुघनाथ

मंस-बली ना माँगती, सब जीवाँ री मात
दारू माँ री भेंट रो, भोपाजी गटकात

तोक लियो कैलास ने, रावण निज भुजपाण
नाभ अनय री भेद दी, एक राम रो बाण

कलजुग में दसमाथ रा,होग्या सौ सौ माथ
राम कठै घुस्या फरै, सीता इब बेनाथ

बरसां जूनी रीत है, बालां पुतलो घास
रावण मन रो बाळ लां, चारुं मेर उजास

जसयो हूं आछो बुरो, थारो हूं मैं मात
पत म्हारी भी राखजे, उजळी करजे रात

बायण थारे देवले, शीस  झुकाऊं आर
सब पर किरपा राखजे, बाडोली दातार

शब्दार्थ-खांडा-तलवार,दुबलां -कमज़ोर, रे-के, लार-साथ, सगती-शक्ति
सामी-सामने/विरुद्ध,रूं-रहूं,मावस-अमावस,गाँव-गुवाङी-गाँव तथा बस्ती
चाँदणौ-उजाला,कद-कब,रुघनाथ-रघुनाथ,मंस-माँस, भोपाजी-पुजारी
 चारुं मेर -चारों तरफ़,बायण-एक लोक देवी ,आर-आकर, बाडोली -क्षेत्र विशेष की लोकदेवी
जे अम्बे
खुरशीद'खैराड़ी' ग्राम-बीकरण तह-मांडलगढ़ भीलवाड़ा(राजस्थान)
हाळ मुकाम-जोधपुर ०९४१३४०८४२२