एक ग़ज़ल, पहली बार प्रयुक्त रदीफ़ 'ओके' के साथ। एक प्रयोग आप सभी के आशीष का अभिलाषी।
आँखों पर पट्टी, होंठों पर ताला रक्खेंगे ओके !
हम इतिहास हमारे युग का काला रक्खेंगे ओके !
तेरे जयकारे बोलेंगे पीर हमारी बिसराकर,
आज छुपाकर अपने उर का छाला रक्खेंगे ओके !
जिस थाली में खाए छेद न उसमें कर पाए कोई,
हर थाली में विष का एक निवाला रक्खेंगे ओके !
तेरी चालीसा गाएंगे हर चैनल पर आकर हम,
हर आखर बालेंगे, बंद रिसाला रक्खेंगे ओके !
बिजली, पानी, रोटी, कपड़ा, रोज़ी चाहत है किसकी,
सर पर झंडा, बैनर एक दुशाला रक्खेंगे ओके !
मीलों पर ताले जड़ देंगे, हर इस्कूल रखेंगे बंद ,
मस्त रहें सब रिंद खुली मधुशाला रक्खेंगे ओके !
तू है चोर लुटेरा जाँच परख कर मान लिया सबने,
डर मत ! तुझको बस्ती का रखवाला रक्खेंगे ओके !
मरणासन्न विधायक जी को चमचों ने आश्वस्त किया,
हाथ में माइक और गले में माला रक्खेंगे ओके !
लाएंगे इक भोर उजाले वाली, अँधियारे में भी,
यूँ 'ख़ुरशीद' जी अपना दर्जा आला रक्खेंगे ओके !
©'ख़ुरशीद' खैराड़ी । जोधपुर ।