शुक्रवार, 1 जून 2018

एक ग़ज़ल-वज़ल

212--212--212--212
दोस्ती-वोस्ती कुछ नहीं है यहाँ
दुश्मनी-वुश्मनी कुछ नहीं है यहाँ

कोशिशें एक तुझको भुलाने की है
शाइरी-वाइरी कुछ नहीं है यहाँ

हाल इक बार तू पूछ तो लो मेरा
ज़िंदगी-विंदगी कुछ नही है यहाँ

सर्द आहें तेरी याद में भरते हैं
जनवरी-वनवरी कुछ नहीं है यहाँ

शह्र था हाँ कभी, एक जंगल है अब
आदमी-वादमी कुछ नहीं है यहाँ

बिन तेरे है हर इक रात बेनूर सी
चाँदनी-वाँदनी कुछ नहीं है यहाँ

कह दिया जो ख़ुदा तुझको तो कह दिया
बेख़ुदी-वेख़ुदी कुछ नही है यहाँ

तेरी आँखों में डूबे घड़ी भर फ़क़त
मैकशी-वैकशी कुछ नहीं है यहाँ

तेरे होते अँधेरा है 'खुरशीद' क्यों
रौशनी-वौशनी कुछ नहीं है यहाँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर
मैकशी-- मदिरापान
बेख़ुदी-- बेख़बरी/अचेत अवस्था

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