बुधवार, 6 जून 2018

ग़ज़ल-तर्ज़-छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए

212-212-212-212
तर्ज़-छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
इक दिया चाहिए रौशनी के लिए
जल रहा है मेरा दिल इसी के लिए

तुमसे कैसे कहें बोझ है ज़िंदगी
जी रहे हैं तुम्हारी ख़ुशी के लिए

'इक उसी' ने हमारी न परवाह की
हम तड़पते रहे 'इक उसी' के लिए

तुम पशेमां न होना मेरी मौत पर
है बहाने कई ख़ुदकुशी के लिए

एक पत्थर को दिल में बिठा ही लिया
लाज़मी था ख़ुदा बंदगी के लिए

तेरी उल्फ़त में इतना नफ़ा तो हुआ
दर्द मुझको मिला शाइरी के लिए

दिल में 'खुरशीद' के है यही आरज़ू
हो उजाला मयस्सर सभी के लिए
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर ।

शुक्रवार, 1 जून 2018

एक ग़ज़ल-वज़ल

212--212--212--212
दोस्ती-वोस्ती कुछ नहीं है यहाँ
दुश्मनी-वुश्मनी कुछ नहीं है यहाँ

कोशिशें एक तुझको भुलाने की है
शाइरी-वाइरी कुछ नहीं है यहाँ

हाल इक बार तू पूछ तो लो मेरा
ज़िंदगी-विंदगी कुछ नही है यहाँ

सर्द आहें तेरी याद में भरते हैं
जनवरी-वनवरी कुछ नहीं है यहाँ

शह्र था हाँ कभी, एक जंगल है अब
आदमी-वादमी कुछ नहीं है यहाँ

बिन तेरे है हर इक रात बेनूर सी
चाँदनी-वाँदनी कुछ नहीं है यहाँ

कह दिया जो ख़ुदा तुझको तो कह दिया
बेख़ुदी-वेख़ुदी कुछ नही है यहाँ

तेरी आँखों में डूबे घड़ी भर फ़क़त
मैकशी-वैकशी कुछ नहीं है यहाँ

तेरे होते अँधेरा है 'खुरशीद' क्यों
रौशनी-वौशनी कुछ नहीं है यहाँ
©खुरशीद खैराड़ी जोधपुर
मैकशी-- मदिरापान
बेख़ुदी-- बेख़बरी/अचेत अवस्था