रविवार, 4 मई 2014

अदबी दहलीज़ के ग़ज़ल विशेषांक अप्रैल २०१४ में शाया हुई एक ग़ज़ल 'धुआं ही धुआं है जिधर देखता हूं '

धुआँ ही धुआँ है जिधर देखता हूं
सुलगता सबों का जिगर देखता हूं

लगे अज़नबी से ये दीवारोदर क्यूं
बड़ी देर से अपना घर देखता हूं

सिवा मुझ नकारा बशर के अज़ीज़ों
हर इक आदमी पुर हुनर देखता हूं

शनासा कोई हो मेरा भीड़ में इस
सभी अज़नबी है मगर देखता हूं

कहाँ देवता है बताओ मुझे तुम
जिधर देखता हूं हजर देखता हूं

उछाले शजर पर यहाँ संग जिसने
उसी की रिदा में समर देखता हूं

क्यूं अब हाल ‘खुरशीद’ का पूंछते हो
मैं दुनिया उसे छोड़कर  देखता हूं

हजर=पत्थर ,शजर=पेड़ ,रिदा=चादर ,समर=फल

अदबी दहलीज़ के ग़ज़ल विशेषांक में शाया हुई एक ग़ज़ल 'ज़ख्म देगा वही दवा देगा 'अप्रेल २०१४

ज़ख्म देगा वही दवा देगा
बेवफ़ा दर्द फिर नया देगा

बाइरादा कदम बढ़ाना तुम
देखना कोह रास्ता देगा

ठोकरों का ये सिल्सिला तुमको
देखना दौड़ना सिखा देगा 

भूख को वो बनाएगा मुद्दा
खेत पहले सभी जला देगा

पढ़ना खुरशीद की ग़ज़ल ग़म में
उसका हर शेर हौंसला देगा