धुआँ ही धुआँ है
जिधर देखता हूं
सुलगता सबों का
जिगर देखता हूं
लगे अज़नबी से ये
दीवारोदर क्यूं
बड़ी देर से अपना घर
देखता हूं
सिवा मुझ नकारा बशर
के अज़ीज़ों
हर इक आदमी पुर
हुनर देखता हूं
शनासा कोई हो मेरा
भीड़ में इस
सभी अज़नबी है मगर
देखता हूं
कहाँ देवता है बताओ
मुझे तुम
जिधर देखता हूं हजर
देखता हूं
उछाले शजर पर यहाँ
संग जिसने
उसी की रिदा में
समर देखता हूं
क्यूं अब हाल
‘खुरशीद’ का पूंछते हो
मैं दुनिया उसे
छोड़कर देखता हूं
हजर=पत्थर ,शजर=पेड़
,रिदा=चादर ,समर=फल