सोमवार, 3 मार्च 2014

आ.नवीन भाई सा. के पोर्टल 'ठाले बैठे] में शामिल होली के सरस दोहे

फागुन आया है सखी, नाचे मन का मोर - खुर्शीद खैराड़ी
फागुन आया है सखी, नाचे मन का मोर 
हर बाला है राधिके, बालक नंद किशोर  

फागुन की मस्ती चढ़ी, बाजे ढोलक चंग
धरती के उल्लास का, नभ तक छाया  रंग

गीत सुनाते होरिये, देते ढप पर थाप
सबके मुखड़े है रँगे, कौ बेटा कौ बाप

भीगे तन से कंचुकी, चिपकी ऐसे आज
बूढ़ों तक के नैन की, बूड़ गई है लाज

लाली मेरे गाल की ,और हुई है लाल
बाँह पकड़ कर श्याम ने, मल दी लाल गुलाल

जल जाये मन की घृणा ,बच जाये बस प्यार
आओ खेलें प्यार से ,प्यार भरा त्यौहार

छायी मस्ती गैर की, गली गली में धूम
गाऊंगा मैं रात भर ,संग सखी तू झूम

होली में होलें सगे, भूलें सारा बैर
आओ लग जायें गले, माँगे सबकी खैर

भांग चढ़ा कर जेठ जी, भूल गए मर्याद
सुन कर मैं शरमा गई, प्रेम पगे संवाद

भर पिचकारी रंग की, मारे मो पे धार
देवर मेरा लाड़ला, मुस्कावे भरतार

जीजा साली साथ में, खेल रहे हैं फाग
तन रँगना तुम प्रेम से, मन रखना बेदाग़

होली के माहौल को, करते लोग ख़राब
त्यौहारों की आड़ में, पीते ख़ूब शराब

गैर-होली का एक नृत्य भरतार-पति

'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर राजस्थान

आ.नवीन भाई सा. के पोर्टल 'ठाले बैठे' के होली विशेषांक फरवरी २०१४ में शामिल होली की एक ग़ज़ल '...रँग देना '

खुशियों से उस दिलबर का घर रँग देना - खुर्शीद खैराड़ी
खुशियों से उस दिलबर का घर रँग देना
गम से   मेरे    दीवारोदर   रँग देना

उम्मीदों  के  सूरज !  ढलने से पहले
देहातों  का  धूसर  मंज़र  रँग देना

साये का तन काला ही तुम पाओगे
रंग न लायेगा कुछ पैकर रँग देना

याद बहुत आये हर होली पर ज़ालिम
तेरा मुझको पास बुलाकर रँग देना

शीश झुकाऊं मातृधरा की रज तुझको
आशीषों से तू मेरा सर रँग देना

एक परेवा गीत कफ़स में गाता है
परवाज़ों से फिर मेरे पर रँग देना

ज्ञान युगों से काग़ज़ काले करता है
श्रद्धा चाहे केवल पत्थर रँग देना

रंग चढ़ा है मुझ पर साजन का श्यामल
व्यर्थ रहेगा यारों मुझ पर रँग देना

सुन खुरशीदबुझाना मत अश्कों से

आग अगर दिल में हो आखर रँग देना

'शब्द प्रवाह ' के ग़ज़ल गीतिका विशेषांक दिस.२०१३ में प्रकाशित ग़ज़ल 'हरे पीड़ा दुखी मन की.......


प्रतिष्टित 'लफ्ज़' पोर्टल की तरही १६ में सराही गई एक ग़ज़ल 'तेरी ज़फ़ा का जो दिल पर जमील छाला है' जन.२०१४