फागुन आया है सखी, नाचे मन का मोर - खुर्शीद खैराड़ी
फागुन आया है सखी, नाचे
मन का मोर
हर बाला है राधिके, बालक
नंद किशोर
फागुन की मस्ती चढ़ी, बाजे
ढोलक चंग
धरती के उल्लास का, नभ
तक छाया रंग
गीत सुनाते होरिये, देते
ढप पर थाप
सबके मुखड़े है रँगे, कौ
बेटा कौ बाप
भीगे तन से कंचुकी, चिपकी
ऐसे आज
बूढ़ों तक के नैन की, बूड़
गई है लाज
लाली मेरे गाल की ,और हुई है
लाल
बाँह पकड़ कर श्याम ने, मल दी लाल गुलाल
जल जाये मन की घृणा ,बच जाये
बस प्यार
आओ खेलें प्यार से ,प्यार भरा
त्यौहार
छायी मस्ती गैर की, गली
गली में धूम
गाऊंगा मैं रात भर ,संग सखी
तू झूम
होली में होलें सगे, भूलें
सारा बैर
आओ लग जायें गले, माँगे
सबकी खैर
भांग चढ़ा कर जेठ जी, भूल
गए मर्याद
सुन कर मैं शरमा गई, प्रेम
पगे संवाद
भर पिचकारी रंग की, मारे
मो पे धार
देवर मेरा लाड़ला, मुस्कावे
भरतार
जीजा साली साथ में, खेल
रहे हैं फाग
तन रँगना तुम प्रेम से, मन रखना बेदाग़
होली के माहौल को, करते
लोग ख़राब
त्यौहारों की आड़ में, पीते ख़ूब शराब
गैर-होली का एक नृत्य भरतार-पति
'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर राजस्थान
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