बुधवार, 25 सितंबर 2013

'परिंदे' पत्रिका के जून -जुलाई २०१३ अंक में 'मेरी ग़ुरबत नसीबों का .....'

मेरी गुरबत नसीबों का तमाशा हो नहीं सकती
कहीं बस गुल, कहीं बस खार कुदरत बो नहीं  सकती

पड़े फीके सभी गहने जवाहर-मोतियों वाले
पसीने के मोती  की जगमगाहट खो नहीं सकती

जहां नींदे कलम की हो उडी शब देखकर यारों
कभी उस मुल्क की किस्मत अदीबों सो नहीं सकती

भरा बस पेट खुद का भूख के इस दौर में हमने
हमारे पाप को गंगा मैया भी धो नहीं सकती

मेरी मुस्कान को खुश दौर का सिम्बल बनाओ मत
हुए हालत बद इतने रियाया रो नहीं सकती

गरीबी को मिटाने का करे दावा सियासत फिर
बिना इसके अमीरों पर इनायत हो नहीं सकती

जलूंगा जब तलक है सांस यूँ 'खुरशीद' ने ठाना
मेरी रू जुल्मतों का बोझ इतना ढो नहीं सकती
       परिंदे जून-जुलाई२०१३ खुरशीद 'खैराड़ी' जोधपुर ०९४१३४०८४२२

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