बुधवार, 16 सितंबर 2020

एक ग़ज़ल ओके

 एक ग़ज़ल, पहली बार प्रयुक्त रदीफ़ 'ओके' के साथ। एक प्रयोग आप सभी के आशीष का अभिलाषी।

आँखों पर पट्टी, होंठों पर ताला रक्खेंगे ओके !

हम इतिहास हमारे युग का काला रक्खेंगे ओके !


तेरे जयकारे बोलेंगे पीर हमारी बिसराकर,

आज छुपाकर अपने उर का छाला रक्खेंगे ओके !


जिस थाली में खाए छेद न उसमें कर पाए कोई,

हर थाली में विष का एक निवाला रक्खेंगे ओके !


तेरी चालीसा गाएंगे हर चैनल पर आकर हम,

हर आखर बालेंगे, बंद रिसाला रक्खेंगे ओके !


बिजली, पानी, रोटी, कपड़ा, रोज़ी चाहत है किसकी,

सर पर झंडा, बैनर एक दुशाला रक्खेंगे ओके !


मीलों पर ताले जड़ देंगे, हर इस्कूल रखेंगे बंद ,

मस्त रहें सब रिंद खुली मधुशाला रक्खेंगे ओके !


तू है चोर लुटेरा जाँच परख कर मान लिया सबने,

डर मत ! तुझको बस्ती का रखवाला रक्खेंगे ओके !


मरणासन्न विधायक जी को चमचों ने आश्वस्त किया,

हाथ में माइक और गले में माला रक्खेंगे ओके !


लाएंगे इक भोर उजाले वाली, अँधियारे में भी,

यूँ 'ख़ुरशीद' जी अपना दर्जा आला रक्खेंगे ओके !

©'ख़ुरशीद' खैराड़ी । जोधपुर ।