बर्बादी का मेरी जिनको किंचित आज मलाल नहीं है ।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
फूँक रहे जो मेरा आँचल ।
शहरों-शहरों करते दंगल ।
आग लगाकर भाग रहे जो ।
पकड़ो उनको उनसे पूछो ।
क्या यह उनका देश नहीं है?
या परिचित परिवेश नहीं है ?
मौन रहे तो होंगे पापी ।
सभी धुरंधर सभी प्रतापी ।
आज बनाकर टीमें-टोली ।
खेल रहे हैं खूँ की होली ।
मुट्ठी में बारूद भरे हैं कोई रंग गुलाल नहीं है ।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
सड़कों पर पत्थर बरसाते ।
फूँक बसों को ये इतराते ।
हाथों में कानून उठाकर ।
फूँक रहे सरकारी दफ़्तर ।
छात्र अगर संजीदा होते ।
देख वतन की हालत रोते ।
भारत भू के उजले सपने ।
नहीं फूँकते घर को अपने ।
हाथ मशाले जलते परचम ।
आग लगी है पूरब-पश्चम ।
शांति अहिंसा की धरती पर क्या यह क्रांति बवाल नहीं है ?
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
कहाँ गया वो भाईचारा ।
'हिंदी हैं हम' का वो नारा ।
लाल-सलामी नीले झण्डे ।
केसरिया परचम ले डण्डे ।
भाई मिलकर करते दंगा ।
सुलग रहा है कहीं तिरंगा ।
हाथ तमंचा गाँधीवादी ।
और कफ़न भी लाई खादी ।
बापू के सपनों का भारत ।
लिखने बैठा नई इबारत ।
फूँक रहे घर को घरवाले कहीं विदेशी चाल नहीं है ।।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
अँधा शासन मौन प्रशासन ।
सत्ता करती है शीर्षासन ।
सूरज आया माथे ऊपर ।
ओढ़ रखी है सबने चादर ।
सुलग रहे हैं यूपी दिल्ली ।
नौंच रही है खम्भा बिल्ली ।
चाह रहे हैं जो बँटवारा ।
उनको दो संदेश करारा ।
मेरठ-लखनव या कलकत्ता ।
सब पर भारत की है सत्ता ।
शारदा-सुतों की चुप्पी क्या जयचंदों को ढाल नहीं है ।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
गूँगों चीखो शोर मचाओ ।
धरती ओ आकाश गुँजाओ ।
अँधों अपनी आँखें खोलो ।
जो दिखता है सच-सच बोलो ।
बैसाखी पर खड़ा हिमालय ।
बोल रहा भारत माँ की जय ।
थार-कच्छ या कोरोमंडल ।
ब्रहमपुत्र-गंगा-पुष्कर-डल ।
पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खन ।
एक लहू है इक ही धड़कन ।
काट रहे हो जिसको क्या वो आश्रय देती डाल नहीं है ।।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
फूँक रहे जो मेरा आँचल ।
शहरों-शहरों करते दंगल ।
आग लगाकर भाग रहे जो ।
पकड़ो उनको उनसे पूछो ।
क्या यह उनका देश नहीं है?
या परिचित परिवेश नहीं है ?
मौन रहे तो होंगे पापी ।
सभी धुरंधर सभी प्रतापी ।
आज बनाकर टीमें-टोली ।
खेल रहे हैं खूँ की होली ।
मुट्ठी में बारूद भरे हैं कोई रंग गुलाल नहीं है ।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
सड़कों पर पत्थर बरसाते ।
फूँक बसों को ये इतराते ।
हाथों में कानून उठाकर ।
फूँक रहे सरकारी दफ़्तर ।
छात्र अगर संजीदा होते ।
देख वतन की हालत रोते ।
भारत भू के उजले सपने ।
नहीं फूँकते घर को अपने ।
हाथ मशाले जलते परचम ।
आग लगी है पूरब-पश्चम ।
शांति अहिंसा की धरती पर क्या यह क्रांति बवाल नहीं है ?
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
कहाँ गया वो भाईचारा ।
'हिंदी हैं हम' का वो नारा ।
लाल-सलामी नीले झण्डे ।
केसरिया परचम ले डण्डे ।
भाई मिलकर करते दंगा ।
सुलग रहा है कहीं तिरंगा ।
हाथ तमंचा गाँधीवादी ।
और कफ़न भी लाई खादी ।
बापू के सपनों का भारत ।
लिखने बैठा नई इबारत ।
फूँक रहे घर को घरवाले कहीं विदेशी चाल नहीं है ।।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
अँधा शासन मौन प्रशासन ।
सत्ता करती है शीर्षासन ।
सूरज आया माथे ऊपर ।
ओढ़ रखी है सबने चादर ।
सुलग रहे हैं यूपी दिल्ली ।
नौंच रही है खम्भा बिल्ली ।
चाह रहे हैं जो बँटवारा ।
उनको दो संदेश करारा ।
मेरठ-लखनव या कलकत्ता ।
सब पर भारत की है सत्ता ।
शारदा-सुतों की चुप्पी क्या जयचंदों को ढाल नहीं है ।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
गूँगों चीखो शोर मचाओ ।
धरती ओ आकाश गुँजाओ ।
अँधों अपनी आँखें खोलो ।
जो दिखता है सच-सच बोलो ।
बैसाखी पर खड़ा हिमालय ।
बोल रहा भारत माँ की जय ।
थार-कच्छ या कोरोमंडल ।
ब्रहमपुत्र-गंगा-पुष्कर-डल ।
पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खन ।
एक लहू है इक ही धड़कन ।
काट रहे हो जिसको क्या वो आश्रय देती डाल नहीं है ।।
होंगे घुसपैठी ही शायद ये तो मेरे लाल नहीं है ।।
©महावीर सिंह जोधपुर। 9413408422