रविवार, 27 मई 2018

ग़ज़ल 2122-1122-1122-112 मुझको

2122-1122-1122--112(22)
हर तरफ़ तेरा ही जल्वा नज़र आए मुझको
बेख़ुदी में हूँ कोई होश में लाए मुझको

आज इक लाश हूँ लेकिन य' तमन्ना है मेरी
अपने हाथों से वो दुल्हन सा सजाए मुझको

मेरे मलबे में कहीं दफ़्न न हो जाए जहां
या ख़ुदा कोई तो ढहने से बचाए मुझको

अपनी आँखों से हटाने की क़वायद छोड़े
मेरी तस्वीर से वो पहले हटाए मुझको

बेरहम वक़्त से कहदो कि रहम मुझ प' करे
छेड़ कर ज़िक्र अब उसका न रुलाए मुझको

मैं सुलगता हुआ इक दश्त हूँ अपने तन में
अब्र बनकर कोई आए कि बुझाए मुझको

मैं तो 'खुरशीद' हूँ मुझसे है उजाला क़ायम
जुगनुओं से कहो रस्ता न दिखाए मुझको
©'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर 9413408422
27.5.2018 शाम 9 बजे
दश्त--बियाबां/जंगल
अब्र--बादल। खुरशीद--सूरज